कटनी में सात दशक पुरानी चेट्रीचंड महोत्सव मनाने की परंपरा,1959 में पहली बार मनाई गई झूलेलाल जयंती, 51 रूपए आया था खर्च,सिन्धु सभ्यता एवं संस्कृति के प्रतीक झूलेलाल जन्मोत्सव पर विशेष
कटनी। सिंधी समाज के आराध्य भगवान श्री झूलेलाल जी की जयंती प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी कटनी शहर एवं माधवनगर में अपार उत्साह, उमंग एवं हर्षोल्लासमय वातावरण के बीच मनाया जाता है कटनी में भगवान श्री झूलेलाल जी का जन्मोत्सव मनाने की परंपरा करीब सात दशक पुरानी है। बात करें 1959 की, तब भगवान श्री झूलेलाल जी का जन्मोत्सव मनाने की शुरूआत की गई और तब स्टेशन रोड के व्यापारियों सर्वश्री स्व. गिरधारीलाल खूबचंदानी, स्व. सच्चानंद लालवानी, स्व. श्रीचंद पमनानी, स्व. सहजराम, स्व. पमनदास माखीजा, स्व. किशनचंद पोपटानी, किशनचंद मूरजमल आदि ने पहल की और पहली बार भगवान श्री झूलेलाल जी जन्मोत्सव मनाया गया। उस समय मात्र 51 रूपए का खर्च हुआ था। प्रारंभ में तो सिर्फ बहराणा साहब की अखण्ड ज्योति ही निकाली जाती थी। समय बीतता गया और नौजवानों के नेतृत्व में नई-नई गतिविधियां होने लगी, जिसका पूरा श्रेय स्व. गिरधारीलाल खूबचंदानी को जाता है, जिन्होंने सामाजिक संस्थाओं को प्रेरित करते हुए चेट्रीचंड पर होने वाले आयोजनों रूपरेखा तैयार की। शहर के समाजसेवी संजय खूबचंदानी ने अतीत की कुछ पुरानी यादों का जिक्र करते हुए कहा कि चेट्रीचंड का पर्व भगवान श्री झूलेलाल जी के जन्मदिवस के साथ ही सिंधु संस्कृति की याद दिलाता है। सिन्धी संस्कृति, जो अति प्राचीन मानी गई है, हड़प्पा मोहन जोदड़ो, इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है। सिन्धु संस्कृति एवं सभ्यता का कुछ अंश आज भी चेट्रीचंड्र पर्व पर दिखाई देते हैं। 1947 में जब देश को स्वतंत्रता मिली और हिन्दुस्तान-पाकिस्तान दो अलग-अलग राष्ट्र बने, तब सिन्ध में बसे सिन्धुवासियों को अपना वतन सिंध छोडक़र भारत आना पड़ा और नए राष्ट्र भारत में आकर भारत को अपनी मातृभूमि बनाना पड़ा। सिंधी समाज के लोग आज भी अपने इष्ट देव भगवान झूलेलाल जी को नहीं भूले थे। उनकी स्तुति करते आ रहे हैं और रोजगार के साथ ही अपनी संस्कृति, सभ्यता और भाषा को भी नहीं भूले हैं।
अब बात यह सामने आई कि चेट्रीचंड तो मनाते है, पर उसका क्या महत्व है। यहां के लोगों को कैसे पता चले, इसके लिए चेट्रीचण्ड्र महोत्सव पर बुद्धिजीवियों व जनप्रतिनिधियों की बैठक स्टेशन रोड रेस्ट हाउस में होने लगी। सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होने लगे। सन 1978 में गुरुनानक वार्ड स्थित श्री झूलेलाल मंदिर का निर्माण हुआ और धीरे-धीरे चेट्रीचंड महोत्सव की भव्यता बढ़ाने और आयोजन को वृहद रूप देने के लिए स्व. प्रेम चेलानी, स्व. होतचंद बजाज, स्व.खियलदास प्रथ्यानी, स्व. जयरामदास गांधी, स्व. नामदेव केसवानी, स्व. सच्चानंद जसूजा, स्व. मोहन गंगवानी, स्व. जेठानंद गलानी, स्व. जयरामदास पुरूसवानी, स्व. उधाराम मंगलानी, स्व, त्रिलोकचंद रोहरा स्व. आसनदास केसवानी, स्व अर्जुनदास दास रोहरा आदि ने चेट्रीचंड महोत्सव को मनाने में और भव्यता प्रदान की। करीब सात दशक से चली आ रही इस परंपरा ने आज भी एक उत्सव का रूप ले लिया है।
