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Tragedy on Everest: एवरेस्ट फतह करने के बाद हैदराबाद के टेक प्रोफेशनल अरुण कुमार की ‘डेथ ज़ोन’ में मौत, परिवार बोला- ‘शव पहाड़ों में ही रहेगा’

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हैदराबाद/काठमांडू: माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) के शिखर पर तिरंगा फहराकर इतिहास रचने वाले हैदराबाद के 53 वर्षीय टेक प्रोफेशनल अरुण कुमार तिवारी के घर में खुशियों का माहौल मातम में बदल गया। एवरेस्ट फतह करने के बाद नीचे उतरते समय, मुख्य शिखर से महज 60 मीटर नीचे स्थित खतरनाक ‘हिलैरी स्टेप’ के पास उनकी दुखद मौत हो गई।

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इस बड़ी त्रासदी के बीच, अब उनके परिवार ने एक बेहद भारी और भावुक फैसला लिया है। परिवार ने तय किया है कि अरुण कुमार का पार्थिव शरीर अब हमेशा के लिए एवरेस्ट की बर्फीली वादियों में ही रहेगा। इस फैसले के पीछे पहाड़ों के प्रति अरुण का गहरा लगाव और बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियां हैं।

शव को ‘डेथ ज़ोन’ से नीचे लाना क्यों है लगभग नामुमकिन?

8,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई वाले क्षेत्र को पर्वतारोहण की भाषा में ‘डेथ जोन’ (Death Zone) कहा जाता है। यहां से किसी भी पार्थिव शरीर को नीचे लाना न केवल आर्थिक रूप से बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी सबसे चुनौतीपूर्ण काम माना जाता है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

पहाड़ों की गोद में हमेशा के लिए सो गए अरुण

अरुण कुमार तिवारी का पहाड़ों के प्रति एक अनोखा और गहरा जुनून था। परिवार का मानना है कि अरुण हमेशा पहाड़ों में रहने की बात करते थे, इसलिए उनकी आत्मा की शांति और शेरपाओं की जान को खतरे में न डालने के लिए उन्हें एवरेस्ट की गोद में ही विदाई देना सबसे सही फैसला है।

एवरेस्ट के इतिहास में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जहां पर्वतारोहियों के शवों को प्राकृतिक रूप से वहीं छोड़ दिया जाता है, और वे हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों और हिमालय के बर्फ में अमर हो जाते हैं।

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