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Everest Death Zone Mission: एवरेस्ट के ‘डेथ जोन’ से 30 साल बाद भारत लाया जाएगा ‘ग्रीन बूट्स’ का शव; ITBP ने शुरू किया दुनिया का सबसे खतरनाक रेस्क्यू ऑपरेशन

Everest Death Zone Mission: एवरेस्ट के 'डेथ जोन' से 30 साल बाद भारत लाया जाएगा 'ग्रीन बूट्स' का शव; ITBP ने शुरू किया दुनिया का सबसे खतरनाक रेस्क्यू ऑपरेशन

Everest Death Zone Mission: एवरेस्ट के ‘डेथ जोन’ से 30 साल बाद भारत लाया जाएगा ‘ग्रीन बूट्स’ का शव; ITBP ने शुरू किया दुनिया का सबसे खतरनाक रेस्क्यू ऑपरेशन

नई दिल्ली: दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (8,848 मीटर) के सबसे खौफनाक हिस्से ‘डेथ जोन’ (Death Zone) से एक बड़ी और ऐतिहासिक ख़बर सामने आ रही है। पिछले करीब तीन दशकों (30 साल) से बर्फ के साम्राज्य में सोए अज्ञात भारतीय पर्वतारोही, जो पूरी दुनिया में ‘ग्रीन बूट्स’ (Green Boots) के नाम से मशहूर हैं, उनके शव को आखिरकार सम्मानपूर्वक नीचे लाने की तैयारी पूरी कर ली गई है।

भारत की इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP) ने इस बेहद चुनौतीपूर्ण और जानलेवा मिशन के लिए टेंडर जारी कर दिया है। इसके तहत एक विशेषज्ञ हाई-एल्टीट्यूड रिकवरी एजेंसी को नियुक्त किया जा रहा है, जो इस महा-अभियान को अंजाम देगी।

क्या है एवरेस्ट का ‘डेथ जोन’ और क्यों खतरनाक है यह मिशन?

समुद्र तल से 8,000 मीटर से ऊपर के हिस्से को पर्वतारोहण की दुनिया में ‘डेथ जोन’ कहा जाता है। यहाँ का भूगोल और मौसम किसी भी जीवित इंसान के लिए साक्षात काल के समान है:

Everest Death Zone Mission: एवरेस्ट के ‘डेथ जोन’ से 30 साल बाद भारत लाया जाएगा ‘ग्रीन बूट्स’ का शव; ITBP ने शुरू किया दुनिया का सबसे खतरनाक रेस्क्यू ऑपरेशन

 

  • ऑक्सीजन की भारी कमी: इस ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन का स्तर सामान्य से सिर्फ एक तिहाई रह जाता है। जरा सी चूक से दिमाग और फेफड़ों की नसें फटने (HAPE/HACE) का खतरा रहता है।

  • जमा देने वाली ठंड: यहाँ तापमान -16°C से लेकर -40°C तक गिर जाता है। बर्फीली हवाएं और हाड़ कपा देने वाली ठंड शवों को प्राकृतिक रूप से ‘डीप फ्रीजर’ की तरह सुरक्षित रखती है, जिससे वे सड़ते नहीं हैं।

  • शवों का कब्रिस्तान: एक अनुमान के मुताबिक, एवरेस्ट पर करीब 200 से अधिक पर्वतारोहियों के शव बर्फ में दबे हैं। अब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघल रही है, जिससे ये शव धीरे-धीरे बाहर आ रहे हैं।

रेस्क्यू का मास्टर प्लान: 6 जांबाज शेरपा और चीनी अधिकारियों की अनुमति

इस खतरनाक रेस्क्यू ऑपरेशन को इसी साल जून से सितंबर 2026 के बीच अंजाम दिया जाएगा। इसके लिए रणनीति तैयार की गई है:

  • विशेषज्ञ शेरपाओं की तैनाती: इस मिशन के लिए कम से कम 6 ऐसे अनुभवी शेरपाओं को तैनात किया जाएगा, जिन्हें 8,000 मीटर से ऊपर ‘तकनीकी रेस्क्यू’ (Technical Rescue) का लंबा अनुभव है।

  • अंतरराष्ट्रीय औपचारिकताएं: चूंकि ‘ग्रीन बूट्स’ का शव एवरेस्ट के उत्तरी रिज (तिब्बत की ओर) पर है, इसलिए टेंडर हासिल करने वाली एजेंसी को चीन के अधिकारियों से विशेष अनुमति लेनी होगी।

  • भारत वापसी का रूट: शव को रिकवर करने के बाद तिब्बत-नेपाल सीमा के पार ट्रांसपोर्टेशन और प्रत्यावर्तन (Repatriation) की कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी, जिसके बाद इसे नेपाल के रास्ते सम्मानपूर्वक भारत वापस लाया जाएगा।

कौन हैं ‘ग्रीन बूट्स’? 1996 की उस खौफनाक रात की दास्तां

साल 1996 में एवरेस्ट पर एक भयंकर बर्फीला तूफान आया था। उस दौरान भारत की ITBP की एक 6 सदस्यीय टीम उत्तरी रिज से चोटी फतह करने निकली थी।

चढ़ाई के दौरान टीम के तीन सदस्य चोटी के बेहद करीब पहुँच गए थे। लौटते समय रात के वक्त 8,570 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ‘सेकंड स्टेप’ के पास बाकी साथियों ने उनकी हेडलाइट्स को हिलते हुए देखा था, लेकिन कुछ ही देर में वो रोशनी बर्फीले अंधड़ में हमेशा के लिए बुझ गई।

इस हादसे में जान गंवाने वाले वीरों में लांस नायक डोरजे मोरुप, हेड कांस्टेबल त्सेवांग पलजोर और सूबेदार त्सेवांग समनला शामिल थे। इनमें से एक पर्वतारोही का शव एक चूना पत्थर की गुफा में सिमटा हुआ रह गया। उनके पैरों में चमकीले लाइम-ग्रीन (हरे) रंग के पर्वतारोहण के जूते थे, जिसकी वजह से पिछले 30 सालों से हर एवरेस्ट पर्वतारोही इस शव को ‘ग्रीन बूट्स’ के नाम से पुकारता है और यह चोटी के करीब पहुँचने का एक लैंडमार्क बन चुका है।

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