लोकायुक्त ट्रैप मामले में जबलपुर कोर्ट का बड़ा फैसला; ‘रिश्वत की मांग साबित न होने पर केवल रकम बरामदगी के आधार पर नहीं दे सकते सजा’, कर्मचारी बरी

लोकायुक्त ट्रैप मामले में जबलपुर कोर्ट का बड़ा फैसला; ‘रिश्वत की मांग साबित न होने पर केवल रकम बरामदगी के आधार पर नहीं दे सकते सजा’, कर्मचारी बरी

जबलपुर: रिश्वतखोरी के मामलों में जिला न्यायालय जबलपुर के विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) मनीष सिंह ठाकुर की अदालत ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि लोकायुक्त पुलिस या अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहता है कि आरोपी ने वास्तव में रिश्वत की मांग (Demand) की थी, तो महज आरोपी के पास से रकम की बरामदगी (Recovery) के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

इस महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत के आधार पर न्यायालय ने वाणिज्य कर कार्यालय (Sales Tax Office) में पदस्थ सहायक ग्रेड-2 प्रदीप कुमार श्रीवास्तव को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के आरोपों से दोषमुक्त (बरी) कर दिया है।

 क्या था पूरा मामला?

अभियोजन (लोकायुक्त पुलिस जबलपुर) द्वारा प्रस्तुत मामले के अनुसार:

अदालत ने क्यों दिया बरी करने का फैसला?

मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के तर्कों और प्रस्तुत साक्ष्यों का गहन अध्ययन करने के बाद विशेष न्यायाधीश मनीष सिंह ठाकुर की अदालत ने पाया कि:

  1. मांग का सबूत नहीं: अभियोजन पक्ष यह ठोस तरीके से साबित करने में असफल रहा कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी।

  2. विधिक सिद्धांत: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए ‘मांग’ (Demand) और ‘स्वीकृति’ (Acceptance) दोनों का साबित होना अनिवार्य है।

  3. निष्कर्ष: केवल नोटों की बरामदगी से यह सिद्ध नहीं होता कि व्यक्ति ने रिश्वत मांगी थी। अतः मांग का स्वतंत्र व ठोस सबूत न होने के कारण आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया जाता है।

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