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अहंकार का विसर्जन करके सभी प्राणियों के प्रति कोमल बनना ही मार्दव धर्म, पर्वराज पर्यूषण पर्व के द्वितीय दिवस परम पूज्य आर्यिका रत्न श्री 105 भावनामति जी के प्रेरक उद्गार

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कटनी। दिग.जैन समाज के पर्वराज पर्यूषण पर्व के द्वितीय दिवस परम पूज्य आर्यिका रत्न श्री 105 भावनामति जी ने उत्तम मार्दव धर्म पर चर्चा करते हुये कहां कि मार्दव धर्म का अर्थ होता है।

अहंकार का विसर्जन करके सभी प्राणियों के प्रति कोमल बन जाना,मृदु बन जाना, उन्होने आगे कहा कि उपलब्धियों का उत्सव मनाओं लेकिन उनका अहंकार मत करांं आदमी के पास जब पद, पैसा, प्रतिष्ठा आ जाती है तो वह अकड़ कर चलने लगता है। उसमें अकड़ पैदा हो जाती है जबकि अकड़ तो मुर्दापन की पहचान हैं। अतः विनम्र बनों, हाथ जोड़कर चलो, तो दिल अपने आप जुड़ते चले जायेगे।

क्यों कि हाथ जोड़ते है तो दो दिल भी जुड़ जाते है आर्यिका श्री आगे कहा कि हाथ बाधकर चलोगों तो मित्र भी दुश्मन बन जाऐगे अतः अहम का त्याग कर मार्दव भाव अपनी आत्मा में लाये तभी आपका कल्याण होगा।

रात्रि में जैन बोर्डिग परिसर में श्री 1008 शांति सागर रात्रि कालीन पाठशाला की बालक-बालिकाओं एवं शिक्षिकाओं द्वारा भू्रण हत्या पर आधारित नृत्य नाट का मंचन किया गया जिसे देखकर उपस्थित श्रोताओं को सोचने पर मजबूर करने के साथ वातावरण गमगीन हो गया ।

दोपहर में तत्वार्थसूत्र के पुरूस्कार पुर्णजयक बनने का सौभाग्य मिट्ठूलाल जैन एवं अरविन्द्र जैन कोयला वालों को प्राप्त हुआ एवं ध्वजारोहण करने का सौभाग्य नीतेश जैन,नितिन जैन, रेशू के परिजनों को प्राप्त हुआ। मेन रोड़ स्थित श्री 1008 पार्श्वनाथ दिग. जैन पंचायती मंदिर में रात्रि में 48 दीप जलाकर भक्ताम्बर का पाठ किया गया।

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