नई दिल्ली: “एक पुरुष अगर घर से बाहर काम करता है, तो उसे ‘आर्थिक योगदान’ माना जाता है। लेकिन एक महिला जब चौबीस घंटे बिना किसी छुट्टी और बिना किसी वेतन के पूरे घर को संभालती है, तो उसे केवल ‘कर्तव्य’ कहकर आर्थिक गणनाओं से बाहर कर दिया जाता है।”
भारत में सदियों से चली आ रही इस स्थापित व्यवस्था पर अब देश के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की एक कड़क टिप्पणी के बाद नए सिरे से राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है। सुबह की पहली चाय से लेकर रात के अंतिम काम तक, देश की करोड़ों भारतीय गृहिणियां बिना किसी औपचारिक मान्यता के लगातार काम करती हैं। उच्चतम न्यायालय द्वारा गृहिणियों को ‘राष्ट्रनिर्माता’ का दर्जा दिए जाने के बाद अब यह सवाल पुरजोर तरीके से उठ रहा है कि उनके इस अवैतनिक श्रम (Unpaid Labor) को देश की जीडीपी (GDP) और आर्थिक गणनाओं में क्यों नहीं शामिल किया जाना चाहिए?
पूरे परिवार की नींव, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था में ‘अदृश्य’
भारतीय समाज में एक गृहिणी (Housewife/Homemaker) के कार्यों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि उसकी तुलना किसी भी कॉर्पोरेट नौकरी से नहीं की जा सकती:
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बहुआयामी भूमिकाएं: पोषण युक्त खाना बनाना, बच्चों की परवरिश और उन्हें नैतिक मूल्य देना, बुजुर्गों की चौबीस घंटे देखभाल, सीमित आय में घर का पूरा बजट संभालना, और हर परिस्थिति में पूरे परिवार का भावनात्मक सहारा बनना।
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अर्थव्यवस्था का विरोधाभास: यदि यही सारे काम (खाना बनाना, साफ-सफाई, बच्चों की केयरटेकिंग) किसी बाहरी एजेंसी या नौकर से कराए जाएं, तो उसके लिए मोटी रकम चुकानी पड़ती है और वह देश की जीडीपी में जुड़ता है। लेकिन जब एक मां या पत्नी यही काम बिना थके करती है, तो आर्थिक व्यवस्था में उसका मूल्य ‘शून्य’ मान लिया जाता है।
The Unpaid Labor: सुबह की चाय से रात के काम तक… देश की नींव रखने वाली गृहिणियां ‘अदृश्य’ क्यों? सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद जीडीपी में शामिल करने पर छिड़ी बड़ी बहस
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक रुख: ‘यह काम किसी दफ्तर के काम से कम नहीं’
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान गृहिणियों के श्रम को आर्थिक मूल्य देने की आवश्यकता पर कड़ा जोर दिया। अदालत ने साफ किया कि एक गृहिणी के काम की कीमत का आकलन केवल पैसों से नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे पूरी तरह नजरअंदाज करना लैंगिक असमानता और उनके श्रम का अपमान है।
अदालत की इस टिप्पणी ने देश के अर्थशास्त्रियों, नीति निर्माताओं और समाजशास्त्रियों को मजबूर कर दिया है कि वे महिलाओं के इस घरेलू श्रम को ‘घरेलू सकल उत्पाद’ (GDP) का हिस्सा बनाने के लिए एक ठोस और पारदर्शी फॉर्मूला तैयार करें।
क्या हैं इसके पक्ष और विपक्ष के मुख्य तर्क?
इस व्यवस्था को लागू करने को लेकर देश में दो अलग-अलग वैचारिक धाराएं काम कर रही हैं:
| 🟢 पक्ष में तर्क (जीडीपी में शामिल करने के फायदे) | 🔴 विपक्ष/चुनौतियों के तर्क (प्रायोगिक मुश्किलें) |
| वास्तविक जीडीपी की तस्वीर: महिलाओं के काम को शामिल करने से देश की अर्थव्यवस्था का सही और बड़ा आकार सामने आएगा। | सटीक मूल्यांकन का अभाव: यह तय करना बेहद मुश्किल है कि भावनात्मक सहारे और मां के दुलार को मौद्रिक (पैसों) मूल्य में कैसे आंका जाए। |
| महिला सशक्तिकरण: गृहिणियों को आर्थिक पहचान मिलने से समाज और परिवार में उनका सम्मान और निर्णय लेने का अधिकार बढ़ेगा। | नीतिगत जटिलता: क्या सरकार इसके आधार पर गृहिणियों को कोई निश्चित भत्ता या पेंशन दे पाएगी? यह वित्तीय बोझ बढ़ा सकता है। |
| बीमा और मुआवजे में आसानी: दुर्घटना या मृत्यु की स्थिति में गृहिणियों के परिवारों को मिलने वाले कानूनी मुआवजे का निर्धारण सटीक हो सकेगा। | परंपरागत ढांचा: आलोचकों का मानना है कि घरेलू रिश्तों को शुद्ध व्यावसायिक या कमर्शियल नजरिए से देखना पारिवारिक ताने-बाने को प्रभावित कर सकता है। |
