चुनावी मोहरा नहीं, स्थायी सम्मान: भदोही बना संत रविदास नगर; जानिए सीएम योगी के सांस्कृतिक विज़न पर अनिल चौधरी की विशेष टिप्पणी

Cultural Restoration & Politics: संत रविदास के 650वें जयंती वर्ष पर भदोही बना 'संत रविदास नगर'; गुमनाम नायकों और सांस्कृतिक चेता को समर्पित सीएम योगी का विज़न

चुनावी मोहरा नहीं, स्थायी सम्मान: भदोही बना संत रविदास नगर; जानिए सीएम योगी के सांस्कृतिक विज़न पर अनिल चौधरी की विशेष टिप्पणी

विशेष टिप्पणी: अनिल चौधरी (समाजसेवी एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष, जाट महासभा)

संपादन: न्यूज़ डेस्क –उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संत शिरोमणि रविदास जी के 650वें जयंती वर्ष के अवसर पर भदोही जिले का नामकरण पुनः ‘संत रविदास नगर’ करने का ऐतिहासिक ऐलान किया है। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि उस वृहद सांस्कृतिक दृष्टि का विस्तार है, जिसके तहत आजादी के बाद से इतिहास के पन्नों में हाशिये पर धकेल दिए गए लोकनायकों, वीरांगनाओं और उपेक्षित वर्गों को उनका वास्तविक राष्ट्रीय सम्मान लौटाया जा रहा है।

सामाजिक समरसता और ‘समभाव’ का संदेश

संत रविदास ने अपने युग में जाति और वर्ण के बंधनों को चुनौती देकर समाज के वंचित वर्गों को स्वाभिमान का मार्ग दिखाया था। भदोही को उनके नाम की पहचान मिलना यह साबित करता है कि योगी सरकार की नीति किसी वर्ग-विशेष के लिए नहीं, बल्कि ‘सर्वजन हिताय’ और सामाजिक समरसता के प्रति समर्पित है।

यह निर्णय उन पूर्ववर्ती राजनीतिक परिपाटियों से अलग है जहाँ दलित और पिछड़े समाज के प्रतीकों का इस्तेमाल केवल चुनावी माल्यार्पण और तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता था।

इतिहास की मुख्यधारा में गुमनाम वीरांगनाएं और लोकनायक

योगी सरकार की यह मुहिम केवल औपनिवेशिक या मुगलकालीन नामों को बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्थागत ढांचे, पीएसी (PAC) बटालियनों और स्मारकों के माध्यम से उपेक्षित नायकों को स्थायी राष्ट्र-स्मृति में स्थापित करने की है:

सांस्कृतिक गौरव की वापसी: इलाहाबाद से प्रयागराज और फैजाबाद से अयोध्या

मुगल काल में सुनियोजित सांस्कृतिक विस्थापन के तहत गाजीपुर, आजमगढ़, अलीगढ़, इलाहाबाद, फैजाबाद जैसे पौराणिक स्थलों के मूल पहचान को बदला गया था।

जन-आकांक्षाएं और विपक्ष के तर्कों का उत्तर

वर्तमान में संभल को कल्कि नगर/पृथ्वीराज नगर, अलीगढ़ को हरिगढ़ और देवबंद को देववृंदपुर करने की मांगें जन-आस्था से उपजी हैं।

विपक्ष अक्सर यह सवाल उठाता है कि नाम बदलने से मूल मुद्दों (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार) से ध्यान भटकता है। हालांकि, यह तर्क तब निष्प्रभावी हो जाता है जब नीति और प्रतीक साथ-साथ चलते हैं। जब किसी समाज को यह अहसास होता है कि उसके पूर्वज राष्ट्र निर्माण के नायक थे, तो उनमें पैदा होने वाला आत्मगौरव उन्हें शिक्षा, प्रशासन और राष्ट्र-सेवा में अधिक उत्साह से भागीदारी करने के लिए प्रेरित करता है। चुनावी मोहरा नहीं, स्थायी सम्मान: भदोही बना संत रविदास नगर; जानिए सीएम योगी के सांस्कृतिक विज़न पर अनिल चौधरी की विशेष टिप्पणी

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