आखिर क्यों भगवान शिव की पूजा में ‘शंख’ बजाना है सख्त मना? जानें इसके पीछे की खौफनाक असुर कहानी और आध्यात्मिक राज़

आखिर क्यों भगवान शिव की पूजा में 'शंख' बजाना है सख्त मना? जानें इसके पीछे की खौफनाक असुर कहानी और आध्यात्मिक राज़

काशी/हरिद्वार: भगवान भोलेनाथ को ‘आशुतोष’ कहा जाता है, यानी जो अपने भक्तों की थोड़ी सी भक्ति, बेलपत्र, धतूरा और भांग चढ़ाने मात्र से ही अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं। लेकिन शिव जी की विधिक पूजा-अर्चना के कुछ ऐसे कड़े नियम हैं, जिनका पालन न करने पर पूजा अधूरी या निष्फल मानी जाती है। इन्हीं नियमों में से एक सबसे बड़ा नियम यह है कि शिव पूजा में न तो शंख बजाया जाता है और न ही शंख से शिवलिंग पर जल अर्पित किया जाता है। जहाँ आम तौर पर शंख को बेहद पवित्र और लक्ष्मी-विष्णु का प्रतीक मानकर हर घर में पूजा जाता है, वहीं महादेव की आराधना में इसे वर्जित क्यों किया गया है? इसके पीछे बेहद रोचक धार्मिक (पौराणिक) और आध्यात्मिक कारण छिपे हैं।

Mahadev Rahasya: आखिर क्यों भगवान शिव की पूजा में ‘शंख’ बजाना है सख्त मना? जानें इसके पीछे की खौफनाक असुर कहानी और आध्यात्मिक राज़

पौराणिक कारण: जब महादेव ने किया था ‘शंखचूड़’ का वध

शिवपुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, शंख का सीधा संबंध शंखचूड़ नामक एक पराक्रमी और अत्याचारी असुर (राक्षस) से जोड़ा जाता है:

शंखचूड़ का नारायण कनेक्शन: विष्णु पूजा में क्यों है मान्य?

यहाँ एक बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि शंख एक असुर के अवशेषों से बना है, तो भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा में इसे सर्वोच्च स्थान क्यों मिला है?

 आध्यात्मिक कारण: वैराग्य, मौन और समाधि के देवता हैं शिव

पौराणिक कहानी के अलावा, शिव पूजा में शंख न बजाने के पीछे बहुत गहरे मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक (Spiritual) कारण भी बताए गए हैं:

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