राजनीतिक डेस्क। गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के बदले तेवर कहीं उसे ही भारी न पड़ जाए। चुनावों की तारीख नजदीक आते ही कांग्रेस के तेवरों में इतनी तल्खियां आ गई हैं कि पार्टी हरेक मौके पर नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ रही हैं। जिस सांप्रदायिका का आरोप लगातार पार्टी ने 2007 और 2012 में मोदी से गुजरात की सत्ता छीननी चाही थी।
यही शिफूगा दोनों विधानसभा चुनावों में कांग्रेस भारी को पड़ा था।
इन चुनावों को लेकर राजनीतिक पांडित चाहे जो भविष्यवाणी करें लेकिन भाजपाइयों का कहना है कि मोदी और शाह की जोड़ी आखिरी समय पर हार को जीत में बदलने का माद्दा रखती है। इसकी बानगी बने कांग्रेस नेता खुद मानते हैं कि गुजरात के दोनों चुनावों के अलावा यूपी के विधानसभा में भी पार्टी की ओर से की गई टिप्पणी को मोदी ने सांप्रदायिक रंग देकर वोटों का ध्रुविकरण किया था।
भाजपा ही नहीं कांग्रेस के नेता भी मानते हैं कि मोदी को आखिरी समय में भी किसी अवसर को भरपूर तरीके से भुनाना आता है। पार्टी के एक नेता ने 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष की ‘मौत के सौदागर की टिप्पणी का उदाहरण देते हुए कहा कि उस दौरान चुनाव प्रचार अभियान ठीक रास्ते पर चल रहा था लेकिन जैसे ही कांग्रेस अध्यक्ष ने जन सभा में यह टिप्पणी की। तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री ने इसे भुना लिया और वह विधानसभा चुनाव को सांप्रदायिक रंग देने में सफल हो गए। इसके चलते उस दौरान कांग्रेस पक्ष में जो संभवनाएं बन रही थीं वो भी विफल हो गई।
इसी तरह से यूपी के विधानसभा चुनाव 2017 में भी पीएम के प्रचार अभियान ने आखिरी समय में पूरी बाजी पलट कर रख दी थी। यहां तक कि उम्मीद से परे पीएम ने चुनाव के अंतिम चरण में बनारस में हाई वोल्टेज चुनाव प्रचार अभियान चलाकर बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया था। उनकी इस रणनीति ने न केवल विरोधियों को निराश करना शुरू कर दिया था, बल्कि उन्हें दूसरे-तीसरे चरण के चुनाव के बाद से ही अपने प्रचार अभियान की रणनीति बदलने पर विवश होना पड़ा था।
अथक परिश्रम पीएम मोदी के व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका है। पीएम के बारे में आम है कि उन्हें बस लक्ष्य दिखाई देता है। इसके लिए आखिरी समय तक हर विकल्प पर विचार करते हैं। इसके लिए पीएम होमवर्क पर भरपूर भरोसा करते हैं। इस पर पीएम नरेंद्र मोदी के नजदीकी लोगों का कहना है कि उनकी टीम में शामिल हर व्यक्ति बस कर्म करने और फल की इच्छा न रखने वाले गीता के उपदेश को सूत्र वाक्य मानकर चलने वाला होता है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता राजीव प्रताप रूडी ने बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान अमित शाह के बारे में बताते हुए कहा था कि जहां से लोगों की सोच खत्म होती है, उसके आगे शाह सोचना शुरू करते हैं। इसी का नतीजा है कि मोदी-शाह की जोड़ी भाजपा को एक सूत्र में पिरोने के अलावा पार्टी के नेताओं को अनुशासन में रखने में लगातार सफल रही है। वहीं, इससे इतर कांग्रेस पार्टी हर निर्णय लेने से पहले जरूरत से ज्यादा ठोंकने बजाने के लिए मशहूर है, वहीं अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा होमवर्क के बाद निर्णय लेने में देर नहीं लगाती।
