जबलपुर। वट या बरगद के वृक्ष की पूजन करने का पर्व वट सावित्री व्रत। ऐसी मान्यता है क यह पूजन अखंड सुहाग व परिवार की खुशियों के लिए महिलाएं रखती हैं।
व्रत का पौराणिक कथाओं के अनुसार महत्व है लेकन कहीं न कहीं यह व्रत बरगद जैसे अनमोल और उपयोगी वृक्ष को सहेजने का संदेश भी देता है। यह हमारे संस्कार हैं कि यहां वृक्षों का पूजन करना अर्थात उन्हें संरक्षित करने की परंपराएं वर्षों से निभाई जा रही हैं।
अच्छी बात यह है कि घर–परिवार की बड़ी–बुजुर्ग महिलाओं से लेकर नई। नवेली दुल्हनों तक इस परंपरा का निर्वहन उतने ही उत्साह और रीति–रिवाज के साथ किया जा रहा है।
शहर में वट सावित्री व्रत के पूजन पर बरगद की मौली बांधते हुए परिक्रमा करने का नजारा हर गली–मोहल्ले से लेकर कॉलोनियों में भी आम है। ऐसे ही पूजन करने वाली कुछ युवा महिलाओं ने बातचीत करने पर पता चला कि उन्हें अपनी सास से मिली इस विरासत को संभालने में बड़ी खुशी है
अधारताल में रहने वाली रुचिका ने बताया कि उनकी शादी को अभी एक ही साल हुआ है। सास रश्मि अग्रवाल ने कहा कि वट सावित्री का व्रत रहना है और मैंने भी इसे खुशी–खुशी शुरू कर दिया।
मेरा मानना है कि महिलाओं को इन पूजा–पाठ के माध्यम से वृक्षों के संरक्षण की एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। जिसे मैं निभाना चाहती हूं।
इसी तरह नीना शर्मा ने भी बताया कि उनकी भी अभी नई शादी हुई है। ससुराल में वट सावित्री व्रत का पूजन होता था और मैंने भी शुरू कर दिया।
निश्चित रूप से वृक्ष रहेंगे तभी हमें शुद्ध वायु मिलेगी, जिससे हम स्वस्थ रहेंगे और हमारा सुख–सौभाग्य बना रहेगा।
पंचशील नगर में रहने वाली नताशा भी अपनी सास की दी गई वट सावित्री व्रत की परंपरा का निर्वहन करती हैं। उनका मानना है कि युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे अपनी परंपराओं को आने वाली पीढ़ी तक ले जाएं।
