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Vat Savitri Vrat 2021: परंपराओं के संग विरासत में मिला वट वृक्ष को सहेजने का संस्कार

जबलपुर। वट या बरगद के वृक्ष की पूजन करने का पर्व वट सावित्री व्रत। ऐसी मान्यता है क यह पूजन अखंड सुहाग व परिवार की खुशियों के लिए महिलाएं रखती हैं।

व्रत का पौराणिक कथाओं के अनुसार महत्व है लेकन कहीं न कहीं यह व्रत बरगद जैसे अनमोल और उपयोगी वृक्ष को सहेजने का संदेश भी देता है। यह हमारे संस्कार हैं कि यहां वृक्षों का पूजन करना अर्थात उन्हें संरक्षित करने की परंपराएं वर्षों से निभाई जा रही हैं।

अच्छी बात यह है कि घरपरिवार की बड़ीबुजुर्ग महिलाओं से लेकर नई। नवेली दुल्हनों तक इस परंपरा का निर्वहन उतने ही उत्साह और रीतिरिवाज के साथ किया जा रहा है।

शहर में वट सावित्री व्रत के पूजन पर बरगद की मौली बांधते हुए परिक्रमा करने का नजारा हर गलीमोहल्ले से लेकर कॉलोनियों में भी आम है। ऐसे ही पूजन करने वाली कुछ युवा महिलाओं ने बातचीत करने पर पता चला कि उन्हें अपनी सास से मिली इस विरासत को संभालने में बड़ी खुशी है

images 57और वे चाहती हैं कि आगे भी वे बरगद को संरक्षित करने की इस परंपरा का निर्वहन करती रहें। कोरोना के बाद बरगद की महत्ता पता चलने से लोगों में बरगद के वृक्ष को सहेजने के प्रति ज्यादा रुचि आई है। वट सावित्री व्रत का पूजन करने वाली आइडियल स्टेट निवासी निधि अग्रवाल ने बताया कि नईदुनिया द्वारा बहुत ही सही समय पर नईदुनिया वट वृक्ष अभियान चलाया जा रहा है। वर्तमान में इसकी बहुत आवश्यकता है। निधि ने बताया कि उन्हें वट सावित्री व्रत करने की परंपरा अपनी सास से विरासत में मिला है जिसे वे निरंतर निभा रही हैं।

अधारताल में रहने वाली रुचिका ने बताया कि उनकी शादी को अभी एक ही साल हुआ है। सास रश्मि अग्रवाल ने कहा कि वट सावित्री का व्रत रहना है और मैंने भी इसे खुशीखुशी शुरू कर दिया।

मेरा मानना है कि महिलाओं को इन पूजापाठ के माध्यम से वृक्षों के संरक्षण की एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। जिसे मैं निभाना चाहती हूं।

इसी तरह नीना शर्मा ने भी बताया कि उनकी भी अभी नई शादी हुई है। ससुराल में वट सावित्री व्रत का पूजन होता था और मैंने भी शुरू कर दिया।

निश्चित रूप से वृक्ष रहेंगे तभी हमें शुद्ध वायु मिलेगीजिससे हम स्वस्थ रहेंगे और हमारा सुखसौभाग्य बना रहेगा।

पंचशील नगर में रहने वाली नताशा भी अपनी सास की दी गई वट सावित्री व्रत की परंपरा का निर्वहन करती हैं। उनका मानना है कि युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे अपनी परंपराओं को आने वाली पीढ़ी तक ले जाएं।

 

Ashutosh shukla

30 वर्षों से निरन्तर सकारात्मक पत्रकारिता, संपादक यशभारत डॉट काम