नई दिल्ली। Union Budget 2026 वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को लोकसभा में वित्तीय वर्ष 2024–25 का आम बजट पेश किया। मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के पहले पूर्ण बजट पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहीं। आयकर में राहत और विकास योजनाओं को लेकर हुए बड़े ऐलानों से मध्यम वर्ग को राहत मिलने की बात कही गई, लेकिन आम नागरिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही रहता है—सरकार के पास बजट का पैसा आखिर आता कहां से है और खर्च किन मदों में होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बजट को सही अर्थों में समझने के लिए “एक रुपये के हिसाब” को समझना जरूरी है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार की कमाई के प्रमुख स्रोत क्या हैं और जनता से जुटाई गई राशि किन क्षेत्रों में लगाई जाती है।
एक रुपये में पैसा कहां से आया?
- बजट 2024–25 के आंकड़ों के अनुसार सरकार की आय का सबसे बड़ा हिस्सा उधारी और अन्य देनदारियों से आता है। हर एक रुपये में—
- 24 पैसे उधारी व अन्य देनदारियों से
- 22 पैसे आयकर से
- 18 पैसे जीएसटी और अन्य करों से
- 17 पैसे निगम कर (कॉरपोरेट टैक्स) से
- 9 पैसे गैर–कर राजस्व से
- 5 पैसे केंद्रीय उत्पाद शुल्क से
- 4 पैसे सीमा शुल्क से
- 1 पैसा गैर–ऋण पूंजीगत प्राप्तियों से
इससे साफ है कि सरकार की कुल आय का लगभग एक चौथाई हिस्सा कर्ज पर निर्भर है, जबकि प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर सबसे बड़े राजस्व स्रोत बने हुए हैं।
एक रुपये में पैसा कहां गया?
- खर्च के मोर्चे पर सबसे बड़ी राशि कर्ज के ब्याज चुकाने में चली जाती है। पिछले बजट के पैटर्न के अनुसार—
- 20 पैसे ब्याज भुगतान
- 22 पैसे करों में राज्यों की हिस्सेदारी
- 16 पैसे केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं पर
- 8 पैसे केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर
- 8 पैसे रक्षा क्षेत्र पर
- 8 पैसे वित्त आयोग व अन्य मदों पर
- 6 पैसे सब्सिडी पर
- 4 पैसे पेंशन पर
- 8 पैसे अन्य खर्चों पर
यानि सरकार की आय का बड़ा हिस्सा पहले से लिए गए कर्ज का ब्याज चुकाने और राज्यों को उनका हिस्सा देने में चला जाता है। विकास योजनाओं, रक्षा और सब्सिडी पर खर्च इसके बाद आता है।
आम आदमी के लिए क्या मायने?
विशेषज्ञों का कहना है कि करों से होने वाली आय जितनी बढ़ेगी, सरकार की कर्ज पर निर्भरता उतनी ही घटेगी। इससे विकास योजनाओं के लिए ज्यादा धन उपलब्ध हो सकेगा। यही वजह है कि सरकार टैक्स बेस बढ़ाने और डिजिटल अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने पर जोर दे रही है।
बजट सिर्फ घोषणाओं का दस्तावेज नहीं, बल्कि देश की आर्थिक दिशा तय करने वाला रोडमैप है। “एक रुपये का हिसाब” समझने से यह साफ हो जाता है कि जनता से जुटाया गया धन किन प्राथमिकताओं पर खर्च हो रहा है और आने वाले वर्षों में अर्थव्यवस्था की राह कैसी होगी।
