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School Under The Tree: ग्रामीण अंचल में 21 स्कूल ऐसे जिनमें पेड़ के नीचे लग रहीं क्‍लास

permission to teach shrimad bhagvat in school

School Under The Tree: ग्रामीण अंचल में 21 स्कूल ऐसे जिनमें पेड़ के नीचे लग रहीं क्‍लास।   लटेरी क्षेत्र के आनंदपुर क्षेत्र में ही 21 स्कूल ऐसे है, जहां भवन नहीं होने के कारण बच्चों की कक्षाएं पेड़ के नीचे और ग्रामीणों के दहलानों में लग रही है। । प्रदेश सरकार एक तरफ सीएम राइज स्कूलों से लेकर स्कूटी और लैपटाप बांटने पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण अंचल में स्थिति ये है स्कूल शुरू हुए नौ साल हो गए लेकिन बच्चों के बैठने के लिए स्कूल भवन नहीं बन सके।

 

 अब तक नहीं बने भवन

सिरोंज विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस के विधायक रहे स्व. गोवर्धन उपाध्याय ने ग्रामीणों की मांग पर आनंदपुर क्षेत्र में करीब छह प्राथमिक स्कूल खुलवाए थे। उनके प्रयासों से गांवों में स्कूल तो खुल गए लेकिन अब तक भवन नहीं मिले। मंजूरी के नौ साल बाद भी बच्चे पक्के भवन में बैठकर पढ़ाई करने को तरस रहे है।

शिक्षा विभाग के स्थानीय अधिकारियों का कहना है वे नए भवन का प्रस्ताव वरिष्ठ कार्यालय को भेज चुके है लेकिन मंजूरी नहीं मिलने से निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सकता।

 

मवेशी बंधे है और पढ़ रहे हैं बच्चे

आनंदपुर क्षेत्र के ग्राम कोलूखेड़ी का वर्ष 2014 में शुरू हुआ था लेकिन यहां भी अब तक भवन नहीं बना है। स्कूल के बच्चे गांव के समीप एक खेत में पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करते हैं। पेड़ से ही किसान मवेशी बांधता है और उसी के पास कुछ बच्चे जमीन पर तो कुछ जमीन पर आड़े पड़े बिजली के खंभे पर बैठकर पढ़ाई करते है।

इस स्कूल में 25 बच्चे दर्ज है और पढ़ाने के लिए एक नियमित और एक अतिथि शिक्षक है। स्कूल के प्रभारी अनिल मिश्रा बताते है कि बारिश में यही बच्चे किसी के घर के दहलान में बैठ जाते हैं। यहीं पर उनकी पढ़ाई होती है।

इस क्षेत्र में यह अकेला स्कूल नहीं है। आसपास के छह गांवों में यही स्थिति है। कुछ पेड़ के नीचे तो कुछ दहलान में लग रहे है।

 

लटेरी क्षेत्र में 48 भवन क्षतिग्रस्त

लटेरी के बीआरसी प्रमोद विश्वकर्मा के मुताबिक पूरे क्षेत्र में 48 स्कूल भवन क्षतिग्रस्त है । इसके अलावा वर्ष 2014 में शुरू हुए 21 स्कूलों के लिए अब तक भवन स्वीकृत नहीं हुए है। भवन विहिन स्कूलों के लिए जिला शिक्षा अधिकारी को प्रस्ताव भेजा गया है। उनका कहना था कि जहां भवन नहीं है, उन गांवों में वैकल्पिक स्थानों पर कक्षाएं लगाई जा रही है।

इधर, शिक्षकों का कहना है कि वरिष्ठ अधिकारी वैकल्पिक स्थान पर कक्षाएं लगाने के निर्देश देते है लेकिन गांवों में स्थान नहीं बताते। छोटे गांवों में कोई सरकारी भवन ही नहीं होता जहां वे बच्चों को बैठाकर कक्षाएं संचालित कर सके। मजबूरी में हमें कभी पेड़ के नीचे तो कभी गांव के किसी व्यक्ति के घर कक्षाएं लगानी पड़ती है।

क्षेत्र में कोलूखेड़ी के अलावा टांडा चक्क, डुगरवानी, रामटेक कोटरा, चौकीदार पुरा, कुंदनखेड़ी, किलनखेड़ी, शेरगढ गांव में स्कूल पेड़ के नीचे ही लग रहे है।

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