पर्युषण पर्व : उत्तम तप का अर्थ इच्छाओं पर संयम और आत्मशुद्धि
पर्युषण पर्व पर उत्तम तप की महिमा
कटनी। पर्युषण पर्व के सातवें धर्म उत्तम तप पर चर्चा करते हुए विद्वान संतोष शास्त्री ने कहा कि दशलक्षण महापर्व में उत्तम तप को प्रमुख धर्म माना गया है। इसका वास्तविक अर्थ केवल भूखे रहकर शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि अनियंत्रित इच्छाओं और वासनाओं का विवेकपूर्वक निरोध करना है। आचार्य उमास्वामी के अनुसार आत्मसंयम और इच्छाओं पर नियंत्रण ही उत्तम तप का वास्तविक स्वरूप है।
उन्होंने बताया कि तप के अंतर्गत अनशन, अवमौदर्य, वृत्ति परिमाण, रस परित्याग, विविक्त शय्यासन और काय क्लेश जैसे छह बाह्य तप इंद्रियों पर संयम स्थापित करते हैं। वहीं प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान जैसे छह अभ्यंतर तप मन एवं भावों की आंतरिक शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं। जब तप मान-सम्मान, यश अथवा सांसारिक लाभ की इच्छा से मुक्त होकर सम्यक दर्शन और सम्यक ज्ञान के साथ किया जाता है, तभी वह उत्तम तप कहलाता है।
पर्युषण पर्व के अवसर पर रात्रि में दिगंबर जैन पंचायत महासभा एवं आचार्य विद्यासागर नवयुवक मंडल के तत्वावधान में महावीर कीर्ति स्तंभ के समक्ष भव्य महाआरती का आयोजन किया गया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने महाआरती में उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान पुरस्कार वितरण पंचायत अध्यक्ष संजय जैन, उपाध्यक्ष पंचम जैन एवं मंत्री विन्नी जैन द्वारा किया गया।
कार्यक्रम को सफल बनाने में अंशुल जैन शिम्पी, तरुण जैन, पिंकू जैन सहित संस्था के सदस्यों एवं पदाधिकारियों का सराहनीय योगदान रहा। पर्व के दौरान नगर के सभी जैन मंदिरों में प्रतिदिन प्रातः अभिषेक, पूजन एवं धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।