Historical Dhar Bhojshala ASI Survey: 1902 में सर्वे में मिले थे राजा भोज काल के शिलालेख, इनमें दर्ज है ऊं नम: शिवाय व सरस्वतै नम: । मध्य प्रदेश के धार में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को अपनी कहानी कहने के लिए स्वयं बोलने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि यहां पड़े टूटे पत्थर ही पूरी कहानी कह रहे हैं। यहां लगे शिलालेखों की करुण पुकार यदि सुनी जाए, तो उनकी आंख में पानी दिखाई देगा। वे सदियों से मौन हैं, किंतु वर्तमान कालखंड में उनसे मुखर कोई और नहीं।
वर्ष 1902 में यहां सर्वे के तहत जो शिलालेख मिले थे, वे अब भोजशाला के पूर्वी भाग में दीवार पर सुरक्षित रखे गए हैं। ये वास्तव में राजा भोज के कालखंड के बारे में जानकारी देने वाले एक नाटक की पटकथा यानी स्क्रिप्ट है। इस स्क्रिप्ट की भाषा प्राकृत है।
प्राकृत भाषा में स्क्रिप्ट लिखी मिली
इस पर ओम नमः शिवाय, सरस्वतै नमः व भगवान राम का उल्लेख है। बड़ी बात यह है कि जहां भी इस पटकथा पर पूर्ण विराम लगा हुआ है, वहां पर भगवान गणेशजी की आकृति उकेरी गई है। भोजशाला मुक्ति यज्ञ के संयोजक एवं भोजशाला के विशेषज्ञ गोपाल शर्मा ने बताया कि भोजशाला में प्राकृत भाषा में पारिजात मंजरी नाटक की पटकथा यानी स्क्रिप्ट लिखी हुई है।
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यह स्क्रिप्ट 17 अलग-अलग पत्थरों पर अंकित की गई थी। इसके कुछ भाग अर्थात तीन हिस्से धार स्थित भोजशाला में हैं, जबकि कुछ हिस्से धार के किले के संग्रहालय में रखे गए हैं। हल्के काले व भूरे रंग के पत्थरों पर भोज-काल की धार नगरी के 84 चौराहों से लेकर नगर विकास की बात लिखी है। यह मिलना प्रमाण है कि भोजशाला एक श्रेष्ठ विश्वविद्यालय थी। ठीक उसी तरह, जिस तरह नालंदा और तक्षशिला भारत के श्रेष्ठ विश्वविद्यालय थे।
देशभर से आते थे विद्वान
शिलालेख कहते हैं कि भोजशाला वास्तव में मां सरस्वती का मंदिर था। यहां देशभर के विद्वान अध्ययन और पठन-पाठन के लिए आते थे। 13वीं शताब्दी में अर्जुन देव बर्मन के कार्यकाल में कवि मदन द्वारा इस पारिजात मंजरी नाटक की रचना लिखी गई थी, जो यहां शिलालेख पर प्राकृत भाषा में अंकित है।

