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Fuel Price Analysis: 11 दिनों में 4 बार बढ़ीं पेट्रोल-डीजल की कीमतें, फिर भी दुनिया में सबसे सस्ता है भारत का ईंधन; समझें आंकड़ों का पूरा गणित

Petrol Diesel Price

Fuel Price Analysis: 11 दिनों में 4 बार बढ़ीं पेट्रोल-डीजल की कीमतें, फिर भी दुनिया में सबसे सस्ता है भारत का ईंधन; समझें आंकड़ों का पूरा गणित

नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली सहित पूरे भारत में 25 मई को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इस महीने (11 दिनों के भीतर) चौथी बार बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस हालिया बदलाव के बाद दिल्ली में पेट्रोल 7.35 रुपये और डीजल 7.53 रुपये प्रति लीटर महंगा हो गया है। प्रतिशत के लिहाज से देखें तो पेट्रोल में $7.7\%$ और डीजल में $8.6\%$ से ज्यादा का इजाफा हुआ है।

इस बढ़ोतरी के बाद भले ही आम जनता की जेब पर थोड़ा असर पड़ा हो, लेकिन अगर वैश्विक स्तर (Global Level) पर तुलना करें, तो भारत ने अपने नागरिकों पर दुनिया के मुकाबले सबसे कम बोझ डाला है। खाड़ी देशों (जहां खुद का तेल उत्पादन है) को छोड़ दिया जाए, तो भारत आज भी गैर-सब्सिडी वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे सस्ता ईंधन दे रहा है।

क्यों अचानक बढ़े दाम? (होर्मुज संकट की इनसाइड स्टोरी)

इस अचानक आई तेजी की पटकथा आज से करीब 3 महीने पहले ही लिखी जा चुकी थी:

 वैश्विक आंकड़ों की जुबानी: भारत बनाम दुनिया

वैश्विक औसत ईंधन बढ़ोतरी इस दौरान $22.4\%$ रही है, जो भारत की बढ़ोतरी ($7.7\%$) से लगभग तीन गुना ज्यादा है। नीचे दिए गए चार्ट से समझें कि दुनिया के मुकाबले भारत कितनी मजबूत स्थिति में है:

देश / क्षेत्र पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी (%) वर्तमान औसत कीमत (रुपये/लीटर में)
भारत (दिल्ली) 7.7% ₹102.1
जापान 9.7% ₹130+
पाकिस्तान 55.0% ₹135+
नेपाल (पड़ोसी देश) ₹135+
अमेरिका (US) 44.5% टैक्स ढांचे के कारण अलग
म्यांमार 90.0% ₹160+
यूरोपीय संघ (EU) (सभी अर्थव्यवस्थाएं) ₹179 (औसत)

विकसित देशों का हाल: दुनिया की लगभग हर बड़ी विकसित इकोनॉमी में इस समय पेट्रोल 150 रुपये प्रति लीटर के पार बिक रहा है। दिल्ली में ₹102.1 प्रति लीटर की कीमत आज भी दुनिया में सबसे किफायती है।

 भारत के राज्यों में अलग-अलग कीमतें क्यों? (VAT का खेल)

अक्सर आम जनता के मन में सवाल उठता है कि देश के अलग-अलग राज्यों में पेट्रोल के दाम अलग क्यों होते हैं? दरअसल, केंद्र सरकार द्वारा लगाई जाने वाली ‘सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी’ पूरे देश में एक समान होती है, लेकिन राज्य सरकारें अपनी तरफ से इस पर वैल्यू एडेड टैक्स (VAT) लगाती हैं, जो $20\%$ से लेकर $30\%$ से ज्यादा तक होता है।

 रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर अब तक: सरकार ने कितना बोझ उठाया?

यह समझना जरूरी है कि सरकार ने पिछले 4 वर्षों में वैश्विक संकटों का बोझ जनता पर नहीं आने दिया। इसे ‘एब्जॉर्प्शन कॉस्ट’ (Absorption Cost) कहते हैं:

  1. रूस-यूक्रेन युद्ध (2022): भारत G20 का अकेला देश था जिसने युद्ध के दौरान एक्साइज ड्यूटी घटाकर पेट्रोल ₹18 और डीजल ₹16 सस्ता किया था। इसमें OMCs ने ₹24,500 करोड़ का नुकसान खुद उठाया।

  2. घरेलू एलपीजी (LPG): वित्तीय वर्ष 2024-25 में घरेलू गैस सिलेंडरों के दामों को सुरक्षित रखने के लिए तेल कंपनियों ने ₹40,000 करोड़ का अतिरिक्त खर्च वहन किया।

  3. होर्मुज संकट राहत: 27 मार्च, 2026 को केंद्र सरकार ने स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) में सीधे 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती कर डीजल पर उत्पाद शुल्क को शून्य (Zero) कर दिया, जिससे सरकारी खजाने को तुरंत ₹30,000 करोड़ का राजस्व घाटा हुआ।

  4. पुराने ऑयल बॉन्ड्स का बोझ: वर्तमान सरकार यूपीए (UPA) शासनकाल (2005-2010) के दौरान जारी किए गए 1.34 लाख करोड़ रुपये के ‘ऑयल बॉन्ड्स’ का मूलधन और हजारों करोड़ का ब्याज आज भी चुका रही है, जो तत्कालीन सरकार द्वारा कीमतों को कृत्रिम रूप से कम रखने के लिए भविष्य के करदाताओं पर टाला गया कर्ज था।

वर्तमान में पेट्रोल की कीमतों में हुई ₹7 की बढ़ोतरी को नीतिगत विफलता नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर आए एक बहुत बड़े आर्थिक तूफान के खिलाफ भारत की मजबूत वित्तीय रक्षा प्रणाली का एक आंशिक हिस्सा माना जाना चाहिए।

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