कांग्रेस के साथ सहयोगी दलों की नाराजगी: इंडिया गठबंधन का भविष्य खतरे में। लोकसभा चुनाव-2024 में बीजेपी को 240 पर रोकने के बाद कांग्रेस इंडिया गठबंधन के नेतृत्व की तरफ बढ़ रही थी. मगर, हरियाणा, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर के नतीजों की वजह से दिसंबर आते-आते गठबंधन के दलों ने ही कांग्रेस के नेतृत्व पर सवाल उठा दिए और तमाम मुद्दों पर गठबंधन बिखरा हुआ नजर आने लगा. आइए जानते हैं कि इंडिया गठबंधन के दलों में किन अलग-अलग वजहों और मौकों पर कांग्रेस से नाराजगी दिखी.
तृणमूल कांग्रेस
विधानसभा नतीजों के बाद टीएमसी ने राहुल और कांग्रेस के नेतृत्व को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और ममता को नेतृत्व देने की मांग कर दी. साथ ही अडानी मुद्दे पर कांग्रेस से दूरी बना ली और इंडिया ब्लॉक की फ्लोर लीडर्स की बैठक में आना बंद कर दिया. इसके बाद कांग्रेस के ईवीएम के मुद्दे को धड़ाम करते हुए अभिषेक बनर्जी ने ईवीएम को सही ठहराकर रही सही कसर पूरी कर दी.
समाजवादी पार्टी
हरियाणा में शून्य और महाराष्ट्र में मन-मुताबिक सीटें नहीं मिलने से सपा नाखुश हुई तो यूपी में सपा के रुख के चलते उपचुनाव लड़ने से ही कांग्रेस ने मना कर दिया. फिर संसद में सपा संभल का मुद्दा उठाना चाहती थी तो कांग्रेस अडानी के मुद्दे पर डटी रही. आखिरकार सपा ने अडानी के मुद्दे से खुद को अलग किया और इंडिया गठबंधन की फ्लोर लीडर्स की मीटिंग में जाना बंद कर दिया. साथ ही संभल में राहुल-प्रियंका की तेजी भी सपा को रास नहीं आई और अंदरखाने दोनों दलों में खटास आ गई. वहीं यूपी में कांग्रेस के साथ गठबंधन में होने के बावजूद दिल्ली में अखिलेश ने केजरीवाल के साथ खुलकर खड़े होकर कांग्रेस को अपना संदेश दे दिया.
शिवसेना (यूबीटी)
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे को सीएम घोषित नहीं किए जाने से पार्टी नाराज हुई. उसके बाद नतीजे आने पर पार्टी के भीतर कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव में भी जाने से हिंदुत्व वोट छिटका, ये आवाजें उठीं. आखिर में राहुल और कांग्रेस ने लंबी चुप्पी के बाद फिर सावरकर को निशाने पर लिया तो विरोधियों के साथ अपनों से घिरे उद्धव को खुलकर कांग्रेस को नसीहत देनी पड़ रही है.
एनसीपी (शरद चंद्र पवार)
विधानसभा चुनाव में सूपड़ा साफ होने से शरद पवार सकते में हैं. मजबूरी में वो राहुल के अडानी मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे. महाराष्ट्र चुनाव में भी राहुल ने अडानी मुद्दा उठाया, जो धड़ाम हो गया. ऐसे में पवार ने कांग्रेस आलाकमान को सन्देश दिया कि आप अडानी का मुद्दा उठाइए, मुझे दिक्कत नहीं. मगर, ये मुद्दा जनता से कनेक्ट नहीं हो रहा, सियासी फायदा नहीं हो रहा, फिर भी आप बाकी मुद्दों पर इसे ही तरजीह दिए जा रहे हैं. इसके बाद भी पवार की सलाह को अनदेखा कर संसद में राहुल प्रियंका ने अडानी पर हमला जारी रखा.
आम आदमी पार्टी
आप के साथ कांग्रेस का रिश्ता किसी से छिपा नहीं है. पंजाब और हरियाणा के बाद दिल्ली में दोनों आमने-सामने हैं. लोकसभा में सिर्फ दिल्ली में साथ आए तो भी राहुल केजरीवाल ने साझा रैली तक नहीं की. कुल मिलाकर दोनों का सियासी रिश्ता महज केंद्र और संसद में मोदी के खिलाफ साथ दिखने भर का दिखता है.
नेशनल कॉन्फ्रेंस
जम्मू-कश्मीर चुनाव में ठीक से प्रचार प्रसार न करना, ज्यादा सीटें लेकर सिर्फ 6 मुस्लिम विधायक जीत पाना और जम्मू क्षेत्र में कांग्रेस के बीजेपी से मुकाबले में बुरी तरह पिछड़ने से अब्दुल्ला परिवार नाखुश है. उमर मंत्रिमंडल में कांग्रेस शामिल नहीं है और इसी बीच उमर ने टीएमसी की तर्ज पर ईवीएम को सही बताकर कांग्रेस को मुश्किल में डाल दिया.
आरजेडी
पिछले विधानसभा चुनाव में 70 सीटें लेकर महज 19 जीत पाई कांग्रेस ने जब इस बार फिर 70 सीटों का राग अलापा तो लालू ने भी ममता की तर्ज पर इंडिया गठबंधन में नेतृत्व परिवर्तन की बात का समर्थन करके सबको चौंका दिया.
जेएमएम
ज़्यादा सीटें लड़कर विधानसभा चुनाव में कम सीटें जीतने पर हेमंत सोरेन कांग्रेस से अपनी नाराजगी जता चुके हैं. फिर कांग्रेस ने उपमुख्यमंत्री पद की मांग की तो सोरेन ने सिरे से खारिज कर दिया.
कुल मिलाकर इंडिया गठबंधन के दलों में कांग्रेस को लेकर नाराजगी दिख रही है. मगर, इंडिया गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस फिलहाल झुकने की बजाय देखो और इंतजार करो की नीति पर चलते हुए अपने हिसाब से चलते हुए अपने वक्त का इंतजार करने के मूड में है. हालांकि, वो पलटवार कर किसी को नाराज भी नहीं करेगी.
