MP में ‘जाति प्रमाण पत्र’ पर घमासान: मंत्री प्रतिमा बागरी की कुर्सी पर संकट? छानबीन समिति में अटके 7000 नेताओं-अफसरों के केस

MP में 'जाति प्रमाण पत्र' पर घमासान: मंत्री प्रतिमा बागरी की कुर्सी पर संकट? छानबीन समिति में अटके 7000 नेताओं-अफसरों के केस

MP में ‘जाति प्रमाण पत्र’ पर घमासान: मंत्री प्रतिमा बागरी की कुर्सी पर संकट? छानबीन समिति में अटके 7000 नेताओं-अफसरों के केस

भोपाल: मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों मंत्रियों और विधायकों के जाति प्रमाण पत्रों की वैधता को लेकर बहस छिड़ गई है। ताजा मामला नगरीय विकास एवं आवास विभाग की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी का है, जिन्हें आगामी 6 जुलाई को उच्च स्तरीय छानबीन समिति के समक्ष प्रस्तुत होने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, मध्य प्रदेश की राजनीति में यह कोई पहला या इकलौता मामला नहीं है; इससे पहले भी कई कद्दावर नेताओं के जाति प्रमाण पत्र कानूनी और प्रशासनिक जांच के दायरे में आ चुके हैं।

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छानबीन समिति की कछुआ चाल: 15 वर्षों में 7,000 केस लंबित

इस पूरे घटनाक्रम के बीच राज्य स्तरीय छानबीन समिति की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक:

श्रेणी लंबित मामलों की स्थिति
कुल लंबित मामले लगभग 7,000 केस (पिछले 15 वर्षों से)
क्लास 1 और 2 के अधिकारी करीब 500 मामले
साप्ताहिक सुनवाई की सीमा सप्ताह में सिर्फ 1 दिन (अधिकतम 5 मामलों की सुनवाई)

विभागीय अधिकारियों का कहना है कि लंबित मामलों में अधिकांश संख्या अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के मामलों की है। कम कार्यदिवसों और सीमित सुनवाई के कारण मामलों के निराकरण में सालों का वक्त लग रहा है। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा के बजट सत्र में कांग्रेस विधायक हीरालाल अलावा ने भी इस सुस्त प्रक्रिया का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था।

राजनीतिक गलियारों की चर्चा: विशेषज्ञों का मानना है कि नेताओं के जाति प्रमाण पत्रों पर सवाल आमतौर पर उनके चुनाव जीतने के बाद ही उठते हैं, जिससे कई बार पूरी न्याय प्रक्रिया राजनीतिक द्वेष या चुनावी दांव-पेंच में उलझकर रह जाती है। अब सभी की नजरें 6 जुलाई को राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के मामले में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं।

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