MP में ‘जाति प्रमाण पत्र’ पर घमासान: मंत्री प्रतिमा बागरी की कुर्सी पर संकट? छानबीन समिति में अटके 7000 नेताओं-अफसरों के केस
MP में 'जाति प्रमाण पत्र' पर घमासान: मंत्री प्रतिमा बागरी की कुर्सी पर संकट? छानबीन समिति में अटके 7000 नेताओं-अफसरों के केस
MP में ‘जाति प्रमाण पत्र’ पर घमासान: मंत्री प्रतिमा बागरी की कुर्सी पर संकट? छानबीन समिति में अटके 7000 नेताओं-अफसरों के केस
भोपाल: मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों मंत्रियों और विधायकों के जाति प्रमाण पत्रों की वैधता को लेकर बहस छिड़ गई है। ताजा मामला नगरीय विकास एवं आवास विभाग की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी का है, जिन्हें आगामी 6 जुलाई को उच्च स्तरीय छानबीन समिति के समक्ष प्रस्तुत होने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, मध्य प्रदेश की राजनीति में यह कोई पहला या इकलौता मामला नहीं है; इससे पहले भी कई कद्दावर नेताओं के जाति प्रमाण पत्र कानूनी और प्रशासनिक जांच के दायरे में आ चुके हैं।
राज्य मंत्री गौतम टेटवाल और ज्योति धुर्वे के मामलों ने बटोरी थीं सुर्खियां
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गौतम टेटवाल (राज्य मंत्री): टेटवाल की जाति (जीनगर) को ओबीसी बताते हुए शिकायत की गई थी कि उन्होंने अनुसूचित जाति (SC) के लिए सुरक्षित सारंगपुर सीट से चुनाव लड़ा। हालांकि, वर्ष 2015 में राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने उनके प्रमाण पत्र को सही पाया था। बाद में हाई कोर्ट ने भी छानबीन समिति के निर्णय को आधार मानते हुए याचिका को अस्वीकार कर दिया, लेकिन यह मामला सालों तक चर्चा में रहा।
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ज्योति धुर्वे (पूर्व सांसद): बैतूल लोकसभा सीट से दो बार सांसद रहीं ज्योति धुर्वे का ‘गोंड’ जाति प्रमाण पत्र उच्चस्तरीय छानबीन समिति की जांच में अवैध पाया गया था। उन पर आरोप था कि उनका प्रमाण पत्र पिता की जगह पति की जाति के आधार पर बना था। राहत न मिलने के बावजूद, जांच पूरी होने तक वे अपने दो कार्यकाल पूरे कर चुकी थीं।
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जजपाल सिंह जज्जी (पूर्व विधायक): अशोकनगर सीट से चुनाव जीतने के बाद उनके ‘नट’ (SC) जाति प्रमाण पत्र को हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने खारिज कर दिया था, जिसके बाद अगस्त 2023 में उन्हें डबल बेंच से राहत मिली थी। MP में ‘जाति प्रमाण पत्र’ पर घमासान: मंत्री प्रतिमा बागरी की कुर्सी पर संकट? छानबीन समिति में अटके 7000 नेताओं-अफसरों के केस
छानबीन समिति की कछुआ चाल: 15 वर्षों में 7,000 केस लंबित
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राज्य स्तरीय छानबीन समिति की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक:
| श्रेणी | लंबित मामलों की स्थिति |
| कुल लंबित मामले | लगभग 7,000 केस (पिछले 15 वर्षों से) |
| क्लास 1 और 2 के अधिकारी | करीब 500 मामले |
| साप्ताहिक सुनवाई की सीमा | सप्ताह में सिर्फ 1 दिन (अधिकतम 5 मामलों की सुनवाई) |
विभागीय अधिकारियों का कहना है कि लंबित मामलों में अधिकांश संख्या अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के मामलों की है। कम कार्यदिवसों और सीमित सुनवाई के कारण मामलों के निराकरण में सालों का वक्त लग रहा है। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा के बजट सत्र में कांग्रेस विधायक हीरालाल अलावा ने भी इस सुस्त प्रक्रिया का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था।
राजनीतिक गलियारों की चर्चा: विशेषज्ञों का मानना है कि नेताओं के जाति प्रमाण पत्रों पर सवाल आमतौर पर उनके चुनाव जीतने के बाद ही उठते हैं, जिससे कई बार पूरी न्याय प्रक्रिया राजनीतिक द्वेष या चुनावी दांव-पेंच में उलझकर रह जाती है। अब सभी की नजरें 6 जुलाई को राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के मामले में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं।








