kajaliyan tyohar रक्षाबंधन के अगले दिन मनाया जाने वाला कजलिया भुजरियां पर्व आज 20 अगस्त को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। कजलियां पर्व का महाकौशल क्षेत्र में विशेष महत्व माना जाता है। इसके लिए घरों में करीब एक सप्ताह पूर्व से ही कजलियां बोई गई हैं। गुरुवार की शाम को कजलियां को ताल-तलैयों व भगवान को भेंट कर निकाला जाएगा। इसके बाद परम्परानुसार लोग एक दूसरे से कजलियां बदलकर अपनी भूल-चूक भुलाकर गले मिलेंगे। बड़े बुजुर्ग छोटों के कान पर कजलियां खोंसकर उन्हें आशीर्वाद देंगे।
कजलियां मुख्य रूप से बुंदेलखंड में राखी के दूसरे दिन
की जाने वाली एक परंपरा है, जिसमें नागपंचमी के दूसरे
दिन खेतों से लाई गई मिट्टी को बर्तनों में भरकर उसमें गेहूं
बोएं जाते हैं और उन गेंहू के बीजों में रक्षाबंधन के दिन
तक गोबर की खाद और पानी दिया जाता है और
देखभाल की जाती है।
मान्यतानुसार इसका प्रचलन राजा आल्हा ऊदल के समय
से है। यह पर्व अच्छी बारिश, अच्छी फसल और जीवन में
सुख-समृद्धि की कामना से किया जाता है। तकरीबन एक
सप्ताह में गेहूं के पौधे उग आते हैं, जिन्हें भुजरियां कहा
जाता है। फिर रक्षाबंधन के दूसरे दिन महिलाओं द्वारा
इनकी पूजा-अर्चना करके इन टोकरियों को जल स्त्रोतों में
विसर्जित किया जाता है। इस पर्व में रक्षाबंधन के दूसरे
दिन एक-दूसरे को देकर शुभकामनाएं दी जाती है और घर
के बुजुर्गों से आशीर्वाद लिया जाता हैं। श्रावण मास की
पूर्णिमा तक ये भुजरिया चार से छह इंच की हो जाती हैं।
कजलियों (भुजरियां) के दिन महिलाएं पारंपरिक गीत
गाते हुए और गाजे-बाजे के साथ तट या सरोवरों में
कजलियां विसर्जन के लिए ले जाती हैं।
भाई चारे से जुड़ी मान्यता के अनुसार रूठों को मनाने और नए दोस्त बनाने के लिए भी इस महोत्सव का विशेष महत्व माना जाता है। संध्या के समय लोग सज-धजकर नए वस्त्र धारण कर इस त्यौहार का आनंद उठाते देखे जाएंगे। वहीं कई स्थानों पर विभिन्न संगठनों द्वारा कजलियां मिलन समारोह का आयोजन भी किया जाएगा। यह क्रम जन्माष्टमी तक चलेगा। बच्चों में इस पर्व को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है। यह त्यौहार उन बहनों के लिए भी बहुत खास होता है जो सावन में ससुराल से अपने मायके आई हैं। कजलियां त्यौहार के दौरान वे अपनी पुरानी सखी सहेलियां और मोहल्ले की अन्य महिलाओं से मुलाकात करेंगी।
