यहां 56 साल में सिर्फ पांच बार ही महिलाओं के हाथों में आई कमान
रतलाम। मालवा क्षेत्र की राजनीति में खासे महत्वपूर्ण रतलाम जिले की पांच विधानसभा सीटों में महिला मतदाताओं की संख्या भी चार लाख से ज्यादा है। 56 साल में यहां से पांच महिला प्रत्याशियों ने सफलता हासिल की।
जिले में वर्ष 1957 से 2013 तक हुए विधानसभा चुनाव में 18 महिला प्रत्याशियों ने किस्मत आजमाई है। इनमें कांग्रेस-भाजपा के अलावा अन्य दलों के प्रत्याशियों के साथ निर्दलीय भी शामिल हैं। चार बार कांग्रेस और एक बार भाजपा से महिला प्रत्याशी ने सफलता का स्वाद चखा है। कांग्रेस ने आठ बार महिला प्रत्याशियों को मैदान में उतारा, वहीं भाजपा ने के वल दो बार।
वर्तमान में जिले की एक सीट पर महिला विधायक काबिज है। जिले की पांचों विधानसभा सीट पर महिला मतदाताओं की संख्या 4 लाख 73 हजार 364 है। इस बार दो सीट से महिला प्रत्याशियों के मैदान में रहने के समीकरण बन रहे हैं।
1957 में पहली बार यहां से महिला प्रत्शाशी उतरी
जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर पुरुष प्रत्याशियों की तुलना में महिलाओं का प्रतिशत काफी कम रहा है। वर्ष 1957 में पहली बार रतलाम सीट पर महिला प्रत्याशी मैदान में उतरी और उन्हें सफलता भी मिली। इसके बाद 1962, 1972, 1977, 1985, 1990, 1993, 2008 और 2013 में भी महिला प्रत्याशी मैदान में रहीं। इनमें से केवल 1972, 1985, 2008 और 2013 में मतदाताओं ने महिला प्रत्याशियों को सफलता का ताज पहनाया।
2018 के चुनाव को लेकर प्रमुख दल कांग्रेस-भाजपा से अभी तक प्रत्याशियों की अधिकृत घोषणा नहीं हुई है। सभी सीटों पर प्रत्याशियों के नामों को लेकर हर दिन नए-नए समीकरण सामने आ रहे हैं। जानकारों के अनुसार, इस बार के चुनाव में प्रमुख दलों से एक-एक महिला प्रत्याशी के मैदान में रहने की संभावना है।
रतलाम ग्रामीण : एक बार मिली सफलता
वर्ष 1977 से अस्तित्व में आई रतलाम ग्रामीण सीट पर 2003 तक कि सी भी महिला प्रत्याशी ने मैदान में उतरने में रुचि नहीं दिखाई। इस सीट पर पहली बार 2008 में कांग्रेस से लक्ष्मीदेवी खराड़ी, निर्दलीय के रूप में लक्ष्मीबाई रणसिंह और सुशीला सोलंकी मैदान में रहीं। इनमें कांग्रेस की लक्ष्मीदेवी खराड़ी ने सफलता पाई। खराड़ी 2013 के चुनाव में भी कांग्रेस से मैदान में रहीं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। वर्तमान में इस सीट पर महिला मतदाताओं की संख्या 91 हजार 842 है।
रतलाम शहर : पहले चुनाव में ही सफल
वर्ष 1957 में पहली बार हुए चुनाव में ही रतलाम सीट पर महिला प्रत्याशी ने सफलता का डंका बजाया था। इस सीट पर पहली बार दो महिला प्रत्याशी मैदान में उतरी थीं। कांग्रेस से सुमन जैन और निर्दलीय भूरीबाई। मतदाताओं ने कांग्रेस प्रत्याशी का साथ देकर सफलता का ताज पहनाया। इसके बाद 2013 तक 11 बार हुए चुनाव में केवल एक महिला प्रत्याशी मैदान में रही। 2013 में कांग्रेस से अदिति दवेसर मैदान में थीं, लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। वर्तमान में इस सीट पर महिला मतदाताओं की संख्या 94 हजार 970 है।
सैलाना : 2013 में ढहाया कांग्रेस का गढ़
वर्ष 1962 से अस्तित्व में आई सैलाना सीट पर अब तक हुए चुनाव में पांच महिला प्रत्याशी मैदान में रहीं और 2013 के चुनाव में भाजपा से संगीता चारेल ने सफलता हासिल की। पहली बार 1962 में कांग्रेस से सुमन-रामचंद्र और निर्दलीय निर्मला सिंह-नाथराम मैदान में रहीं। 1967 से 1998 तक हुए आठ चुनावा में एक भी महिला प्रत्याशी मैदान में नहीं उतरी। 2003 में निर्दलीय प्रत्याशी शांतिदेवी खराड़ी मैदान में आई। कांग्रेस का गढ़ मानी जाने वाली इस आदिवासी बहुल सीट पर 2008 में पहली बार भाजपा ने महिला प्रत्याशी के रूप में संगीता चारेल को मैदान में उतारा, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें नकार दिया।
2013 में फिर से भाजपा ने चारेल को मैदान में उतारकर कांग्रेस का गढ़ ढहा दिया। वर्तमान में इस सीट पर महिला मतदाताओं की संख्या 91 हजार 633 है।
जावरा : अब तक किसी ने नहीं दिखाई रुचि
वर्ष 1957 से अस्तित्व में आई जावरा सीट से अब तक केवल दो महिला प्रत्याशी ही मैदान में रही हैं। पहली बार 1990 में यहां से दूरदर्शी पार्टी की शांतिदेवी मैदान में उतरीं। 1993 से 2013 तक कि सी महिला प्रत्याशी ने चुनाव मैदान में भाग्य अजमाने में रुचि नहीं दिखाई। महिलाओं के वोटों पर ध्यान लगाए कांग्रेस और भाजपा ने भी इस सीट पर अब तक कि सी भी महिला प्रत्याशी को मैदान में नहीं उतारा है। वर्तमान में इस सीट पर महिला मतदाताओं की संख्या एक लाख 612 है।
आलोट : दो बार मिली सफलता
आलोट विधानसभा सीट पर 1957 से 1967 तक तीन चुनाव में एक भी महिला प्रत्याशी मैदान में नहीं रहीं। 1972 में पहली बार कांग्रेस ने लीलादेवी चौधरी को मैदान में उतारा और उन्होंने सफलता भी प्राप्त की। इसके बाद 1977 में लीलादेवी फिर मैदान में रहीं, लेकिन सफलता नहीं मिली। 1985 में पुनः कांग्रेस से लीलादेवी चौधरी मैदान में उतरीं और उन्होंने सफलता का परचम फहराया। 1993 में लीलादेवी फिर मैदान में उतरीं, लेकिन इस बार वे निर्दलीय थीं और उन्हें करारी पराजय का सामना करना पड़ा था।
इस चुनाव में लीलादेवी को मात्र 317 मत ही मिले थे। 2013 में निर्दलीय के रूप में पुष्पा मैदान में रहीं। उन्हें भी के वल 453 मत मिले थे। वर्तमान में इस सीट पर महिला मतदाताओं की संख्या 94 हजार 307 है।

