होलाष्टक लगने के साथ ही शहर में शुरू हुई होलिका दहन की तैयारी, जगह-जगह सजी होली

कटनी। शहर में होलिका दहन की पारंपरिक तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो गई हैं। शहर से लेकर उपनगरीय क्षेत्रों और ग्रामीण अंचलों में चाक चौराहों और गली मोहल्लों में लकडिय़ां, उपले (गोबर के कंडे) और झाडिय़ां इक_ी की जा रही हैं। कई जगह होलिका की प्रतीकात्मक मूर्ति बनाने के लिए घास-फूस और कपड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा है और प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी शुभ मुहूर्त में ही होलिका दहन की पूजा की तैयारी की जा रही है।

गौरतलब है कि 24 फरवरी को होलाष्टक लगने के साथ ही शहर से लेकर उपनगरीय क्षेत्र और जिले के ग्रामीण अंचलों में होलिका दहन की पारंपरिक तैयारियों ने जोर पकड़ लिया है। शहर के प्रमुख चौराहों व गली मोहल्लों सहित उपनगरीय क्षेत्रों के गली मोहल्लों और गांव-गांव होलिका तैयार करने के लिए लकडिय़ां, सूखी घास-फूस और गाय के गोबर के उपले(कंडे)इकठ्ठे किए जाने लगे हैं। मोहल्लों के चौराहों, खुली जगहों या मंदिरों के आंगन को साफ कर पवित्र किया जा रहा है।

होलिका तैयार करने के बाद परंपरा के अनुसार होलिका और भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा स्थापित की जाएगी और फिर आगामी 3 मार्च को होलिका दहन की रात रोली, फूल, कच्चा सूत, साबुत हल्दी, बताशे और नारियल के साथ विधिवत पूजा अर्चना करके होलिका दहन किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि होली का पर्व पौराणिक पर्व है। इस पर्व को हर धर्म के लोग मनाते हैं। शहर में होलिका दहन की तैयारी शुरू हो गई हैं। जगह-जगह मोहल्लों में होली रखी जा रही है। शहर में सबसे बड़ा होलिका दहन सुभाष चौक, आजाद चौक और चांडक चौक में किया जाता है। शहर के 45 वार्डों में एक सैकड़ा से अधिक स्थानों पर होली का दहन किया जाएगा। होली का पर्व रंग, उमंग और हुरदंग का सबसे अनोखा त्योहार माना जाता है। इस दिन को लोग छोटे-बड़े का ज्ञान छोड़ कर सभी से गले मिल कर बधाइयां देते हैं।

होली पर लकड़ी चढ़ाना पुनीत कार्य

होली पर लकड़ी काट कर रखना पुनीत कार्य माना जाता है। जिले के ग्रामीण अंचलों में युवा वर्ग जंगल से लकड़ी काट कर लाते हैं और होली पर रख कर पुण्य अर्जित करते हैं। इस काम के लिए कोई भी एतराज नहीं करता है। वहीं शहर में भी होली जलाना अब पहले से कम नुकसानदायक रह गया है। शहर में तो अब युवाओं के पास समय नहीं है जो वह जंगल से लकड़ी काट कर लायें, अब तो लोग चंदा करके टाल से लकड़ी खरीद कर लाते हैं तथा लोग घरों से उपला लाकर चढ़ाते हैं। इसलिए पहले की अपेक्षा पर्यावरण को नुकसान कम होता है। पंडितों के अनुसार होली को रखने से पूर्व उसे आसन देना चाहिए। सबसे पहले ईंट व मिट्टी से आसन बनाना चाहिए उसके बाद ही होली रखना व जलाना चाहिए। लेकिन शहर में इस तरह की व्यवस्था कहीं भी देखने को नहीं मिली है। एक समय था जब शहर की आबादी कम थी उस समय तकरीबन 150 जगह होली दहन होता था लेकिन ज्यो-ज्यों आबादी बढ़ती गई। होली जलाने का चलन भी बढ़ता गया। इसके लिए आपसी मनमुटाव भी जिम्मेदार कहे जा सकते हैं।

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