अमेरिका में ‘ग्रीन कार्ड’ पर चली ट्रंप की कैंची, लाखों भारतीयों की जेब खाली करने की तैयारी, देखें नया फीस स्ट्रक्चर

अमेरिका में 'ग्रीन कार्ड' पर चली ट्रंप की कैंची, लाखों भारतीयों की जेब खाली करने की तैयारी, देखें नया फीस स्ट्रक्चर

अमेरिका में ‘ग्रीन कार्ड’ पर चली ट्रंप की कैंची, लाखों भारतीयों की जेब खाली करने की तैयारी, देखें नया फीस स्ट्रक्चर

वॉशिंगटन: अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के दोबारा सत्ता में आने के बाद अप्रवासियों, विशेषकर भारतीय समुदाय की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। ट्रंप प्रशासन के होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) ने एक नया नियम प्रस्तावित किया है, जिसके तहत अमेरिकी नागरिकता हासिल करने और ग्रीन कार्ड (Green Card) से जुड़े जरूरी फॉर्म्स की फीस में 75 से 80 फीसदी तक का भारी इजाफा होने जा रहा है। इस प्रस्ताव के लागू होते ही अमेरिका में बसने का सपना देखना बेहद महंगा हो जाएगा।

 कितना महंगा होगा नागरिकता का फॉर्म (N-400)?

DHS द्वारा जारी किए गए नए प्रस्ताव के अनुसार, नागरिकता आवेदन के लिए भरे जाने वाले फॉर्म N-400 की लागत को दो अलग-अलग तरीकों से बढ़ाया जा रहा है:

किसे मिलेगी राहत? जिन लोगों की घरेलू आय फेडरल पॉवर्टी गाइडलाइंस के 400% से कम है, उनके लिए पेपर फॉर्म की फीस 380 डॉलर ही रहेगी। हालांकि, नए नियम में फीस माफी (Fee Waiver) के विकल्प को पूरी तरह खत्म करने का प्रस्ताव है। यह नया नियम पब्लिक कमेंट के लिए 60 दिनों तक लागू नहीं किया जाएगा।

लगातार घट रहा है भारतीयों को ग्रीन कार्ड मिलने का ग्राफ

H-1B वीजा विवाद और प्रशासनिक कड़ाई के चलते पिछले कुछ सालों में भारतीयों को ग्रीन कार्ड मिलने की संख्या में 50 फीसदी से अधिक की भारी गिरावट आई है:

विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 तक अमेरिका में 60,79,221 भारतीय रह रहे हैं। इनमें से करीब 37 लाख से ज्यादा भारतीय मूल के लोग हैं और 23 लाख से अधिक एनआरआई (NRI) श्रेणी में हैं। फीस में इस भारी बढ़ोतरी के बाद कई भारतीय अब अमेरिका के बजाय दूसरे देशों का रुख करने पर विचार कर सकते हैं।

H-1B वीजा पर पहले ही चल चुकी है ट्रंप की कैंची

यह पहला मौका नहीं है जब ट्रंप प्रशासन ने अप्रवासियों की जेब पर डाका डाला हो। इससे पहले पिछले साल सितंबर में ही राष्ट्रपति ट्रंप ने H-1B वीजा आवेदन की फीस को औसतन 2,000 डॉलर से सीधे बढ़ाकर 1,000,000 डॉलर (1 लाख डॉलर) कर दिया था।

यह फीस उन अमेरिकी नियोक्ताओं (Employers) को चुकानी पड़ती है जो भारत जैसे देशों से कुशल आईटी प्रोफेशनल्स और इंजीनियरों को नौकरी पर बुलाते हैं। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ (America First) पॉलिसी के तहत उठाए जा रहे इन कड़े कदमों से भारतीय टेक प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिकी कंपनियों में नौकरी पाना पहले ही बेहद चुनौतीपूर्ण हो चुका है।

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