Friday, May 8, 2026
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कलेजे के टुकड़े को गोद में लिए बेबस पिता, 40 दिन तक अस्पताल में लड़ी जिंदगी की जंग; मर्चुरी में 4 दिन तक पड़ा रहा मासूम का शव

कलेजे के टुकड़े को गोद में लिए बेबस पिता, 40 दिन तक अस्पताल में लड़ी जिंदगी की जंग; मर्चुरी में 4 दिन तक पड़ा रहा मासूम का शव। जिला अस्पताल परिसर में गुरुवार को एक ऐसी तस्वीर दिखी जिसे देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। एक लाचार पिता अपनी नवजात बेटी का बेजान शरीर गोद में लिए अस्पताल की दहलीज से बाहर निकल रहा था। वह बच्ची, जिसने दुनिया में आते ही 40 दिनों तक मौत से मुकाबला किया, आखिरकार जिंदगी की जंग हार गई और उसका शव पिछले चार दिनों से अस्पताल की मर्चुरी में अपनों का इंतजार कर रहा था।

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कलेजे के टुकड़े को गोद में लिए बेबस पिता, 40 दिन तक अस्पताल में लड़ी जिंदगी की जंग; मर्चुरी में 4 दिन तक पड़ा रहा मासूम का शव

जुड़वां बच्चों ने लिया था जन्म, एक की पहले ही हो गई थी मौत

सिविल सर्जन यूके श्रीवास्तव ने बताया कि आष्टा क्षेत्र के ग्राम हकीमाबाद निवासी अंजनी और रवि रघुवंशी के घर 24 मार्च को जुड़वां बच्चों की किलकारी गूंजी थी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था; प्रसव के दौरान ही एक बच्चे की मौत हो गई। दूसरी बच्ची का वजन मात्र 1.4 किलोग्राम था, जिसके कारण उसकी हालत बेहद नाजुक थी।

40 दिनों तक चला इलाज, 3 मई को थमी सांसें

मासूम को तुरंत विशेष नवजात चिकित्सा इकाई (SNCU) में भर्ती किया गया। अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ ने 40 दिनों तक उसे बचाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन 3 मई की शाम को उसने भी दम तोड़ दिया।

गरीबी या बेबसी? मर्चुरी में रहा 4 दिन का इंतजार

अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, इलाज के दौरान बच्ची के पिता रवि केवल एक-दो बार ही अस्पताल पहुंचे थे। बच्ची की मौत के बाद भी उसका शव लेने में चार दिनों की देरी हुई। यह देरी गरीबी के कारण थी, या संसाधनों के अभाव में उपजी बेबसी, यह सवाल अब भी खड़ा है। गुरुवार को जब पिता अपनी नन्ही परी के शव को लेकर अस्पताल से निकला, तो वहां मौजूद हर शख्स की रूह कांप गई।

Usha Pamnani

20 वर्षों से डिजिटल एवं प्रिंट मीडिया की पत्रकारिता में देश-विदेश, फ़िल्म, खेल सहित सामाजिक खबरों की एक्सपर्ट, वर्तमान में यशभारत डॉट कॉम में वरिष्ठ जिला प्रतिनिधि