CBSE की 3-भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: ‘बच्चों पर न पड़े मानसिक दबाव, समस्याओं का हल निकाले केंद्र’
CBSE की 3-भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: ‘बच्चों पर न पड़े मानसिक दबाव, समस्याओं का हल निकाले केंद्र’
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की उस नीति पर सुनवाई करते हुए बड़ा बयान दिया है, जिसके तहत 9वीं कक्षा के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किया गया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस नीति को लागू करने के दौरान बच्चों पर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ना चाहिए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि नीति की मंशा और इसे लागू करने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन इसे लागू करने के तरीके को लेकर उठ रही व्यावहारिक समस्याओं का समाधान खोजना बेहद जरूरी है।
‘नीति गलत नहीं, लेकिन इसे सुव्यवस्थित करने की जरूरत’
सुनवाई के दौरान बेंच ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार को सामने आ रही रुकावटों पर दोबारा विचार करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “इसमें कोई शक नहीं है कि इस नीति को कभी न कभी लागू किया ही जाना है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन इसे किस तरह सुव्यवस्थित किया जाए ताकि छात्रों, अभिभावकों और स्कूलों के सामने आ रही बाधाओं को दूर किया जा सके, इस पर काम होना चाहिए।”
शिक्षकों व संसाधनों की उपलब्धता: अदालत ने भाषा चुनने के विकल्पों, पर्याप्त शिक्षकों (Human Resource) और आधारभूत ढांचे की उपलब्धता पर भी ध्यान देने की बात कही।
क्या है पूरा विवाद?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत सीबीएसई की इस नई गाइडलाइन के अनुसार, 9वीं कक्षा के छात्रों को तीन भाषाएं (जिसमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना अनिवार्य है) पढ़ना जरूरी किया गया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई थी कि सत्र शुरू होने के बाद इसे लागू करने से उन छात्रों पर भारी दबाव पड़ रहा है जो सालों से कोई विदेशी या अन्य भाषा पढ़ते आ रहे थे। याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि वे भारतीय भाषाएं पढ़ाने के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि बीच सत्र में इसे अचानक लागू करने के तरीके से चिंतित हैं।