श्रावण मास में दो ग्रहण का दुर्लभ संयोग: हरियाली अमावस्या पर सूर्य ग्रहण और रक्षाबंधन पर चंद्र ग्रहण; जानें क्यों भारत में मान्य नहीं होगा ‘सूतक’
उज्जैन: इस वर्ष का श्रावण मास (सावन) खगोल प्रेमियों और धार्मिक दृष्टि से बेहद खास होने जा रहा है। सावन के महीने में इस बार एक ही पक्ष (पखवाड़े) के भीतर दो-दो ग्रहण लगने का एक अत्यंत दुर्लभ खगोलीय संयोग बन रहा है। आगामी 12 अगस्त को हरियाली अमावस्या के दिन खग्रास सूर्य ग्रहण (Total Solar Eclipse) लगेगा, जिसके ठीक बाद 28 अगस्त को श्रावणी पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के पावन पर्व पर खंडग्रास चंद्र ग्रहण (Partial Lunar Eclipse) का नजारा दिखेगा।
एक ही पखवाड़े में सूर्य और चंद्र ग्रहण दोनों का होना विज्ञान की दृष्टि से एक बड़ी और विशेष घटना मानी जा रही है। लेकिन आम जनता और श्रद्धालुओं के लिए राहत की बात यह है कि ये दोनों ही ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देंगे।
भारत में दिखाई नहीं देंगे ग्रहण, इसलिए सूतक काल ‘अमान्य’
उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. अमर डब्बावाला ने बताया कि सनातन धर्मशास्त्रों के नियमों के अनुसार, किसी भी ग्रहण का धार्मिक प्रभाव और उसका ‘सूतक काल’ तभी मान्य होता है, जब वह ग्रहण संबंधित भौगोलिक क्षेत्र या देश में नग्न आंखों से दिखाई दे।
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खुले रहेंगे मंदिरों के पट: चूंकि ये दोनों ग्रहण भारत के किसी भी हिस्से में दृश्यमान नहीं होंगे, इसलिए देश में इसका कोई सूतक काल या पातक नियम लागू नहीं होगा।
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नियमित होगी पूजा-आरती: महाकाल की नगरी उज्जैन सहित देश के सभी प्रमुख मंदिरों के पट अपने तय समय पर खुले रहेंगे। पूजा-अर्चना, बाबा महाकाल की आरती या अन्य किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के समय में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
विज्ञान का नजरिया: क्यों बेहद दुर्लभ है यह खगोलीय घटना?
खगोलविदों (Astronomers) के अनुसार, सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा घूमते हुए पृथ्वी और सूर्य के ठीक बीच में आ जाता है। वहीं, चंद्र ग्रहण तब घटित होता है जब पृथ्वी की छाया चंद्रमा को ढक लेती है।
एक ही पखवाड़े के भीतर अमावस्या पर सूर्य ग्रहण और पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण होना एक स्वाभाविक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, लेकिन यह स्थिति अपेक्षाकृत काफी दुर्लभ होती है। ऐसा केवल तभी संभव हो पाता है जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा अपने परिक्रमा पथ पर ग्रहण बिंदुओं यानी लूनर नोड्स (राहु और केतु बिंदु) के बेहद करीब आ जाते हैं।श्रावण मास में दो ग्रहण का दुर्लभ संयोग: हरियाली अमावस्या पर सूर्य ग्रहण और रक्षाबंधन पर चंद्र ग्रहण; जानें क्यों भारत में मान्य नहीं होगा ‘सूतक’
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बिना किसी बाधा के मनाए जाएंगे त्योहार, अफवाहों पर न दें ध्यान
दक्षिण भारतीय विद्वान ब्रह्मश्री चिलकमर्ति प्रभाकर चक्रवर्ती शर्मा ने भी इस बात की पुष्टि की है कि भारत में अदृश्य रहने वाले ग्रहण का हमारी परंपराओं और त्योहारों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। इसलिए श्रद्धालु बिना किसी असमंजस के अपने पर्व मना सकते हैं:
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हरियाली अमावस्या (12 अगस्त): इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य, पितृ तर्पण, सावन की शिव पूजा और पर्यावरण संरक्षण के लिए किया जाने वाला वृक्षारोपण पूरी तरह से सामान्य दिनों की तरह विधि-विधान से संपन्न होगा।
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रक्षाबंधन (28 अगस्त): भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व, श्रावणी उपाकर्म, नया यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने का संस्कार और पूर्णिमा पूजन बिना किसी बाधा या भद्रा-सूतक के दोष के हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।
विद्वानों की सलाह: इंटरनेट और सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर ग्रहण को लेकर फैलाई जा रही भ्रामक जानकारियों या अफवाहों पर बिल्कुल ध्यान न दें। शास्त्र सम्मत नियमों के अनुसार, भारत में यह काल पूरी तरह शुद्ध और शुभ है।
— उज्जैन ब्यूरो, विशेष धार्मिक एवं वैज्ञानिक रिपोर्ट
