Ram Van Gaman Path: श्रीराम के चरणों से पावन हुई थी विजयराघवगढ़ की भूमि

दो शातब्दी पहले राजा प्रयागराज ने की थी राम वन गमन पथ की खोज

कटनी (राजा दुबे)। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मभूमि में अयोध्या में सैकड़ों साल बाद भव्य राम मंदिर बन कर तैयार है। आगामी 22 जनवरी को देश के प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी की मुख्य यजमानी में यहां रामलला की दिव्य प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा का विराट महोत्सव होने जा रहा।

धार्मिक स्थलों में सतत आयोजन

केवल अयोध्या ही नहीं बल्कि पूरे देश में इस विराट महोत्सव का उत्साह देखते ही बन रहा। सनातनी रामभक्त युवा अयोध्या नगरी से आये अक्षत देकर लोगों को प्राण प्रतिष्ठा समारोह का आमंत्रण बांट रहे। अगले कुछ दिन सभी धार्मिक स्थलों में सतत आयोजन किये जाने की तैयारी है।

इस मौके पर मध्यप्रदेश सरकार ने भी प्रस्तावित राम वन गमन पथ निर्माण की रूप – रेखा बना ली है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की अध्यक्षता में राम वनगमन पथ को लेकर एक बैठक आज चित्रकूट में आयोजित की जा रही।

कटनी जिले के लिए यह अत्यंत सौभाग्य की बात है कि जिले के विजयराघवगढ़ और बड़वारा के कुछ स्थान राम वनगमन पथ का हिस्सा बनेंगे। इस सम्बंध में आवश्यक तथ्य जुटाए जाने का सिलसिला तेज हो गया है।

राजा प्रयागदास को विंध्याचल पर्वत श्रंखला का उत्तरी भाग मिला था

 

मैहर राज्य के बंटवारे के बाद राजा प्रयागदास को विंध्याचल पर्वत श्रंखला का उत्तरी भाग मिला था जिसकी सीमा झुकेही से शुरू होकर मुड़वारा और पूर्व में खितौली तक फैली थी। राजा प्रयागदास भगवान श्रीराम के अनन्य उपासक थे। वे प्रकृतिप्रेमी और आध्यात्मिक व्यक्तित्व के धनी थे।

जब माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ विंध्याचल पर्वत पार करके दंडकारण्य की ओर प्रस्थान किया था

उन्हें इस बात का आभास था कि भगवान श्रीराम ने जब माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ विंध्याचल पर्वत पार करके दंडकारण्य की ओर प्रस्थान किया था तब वे इसी क्षेत्र की पावन भूमि से होकर ही गए थे। अपनी इसी सोच और भावना को आधार बनाकर उन्होंने अपने राज्य का नाम राघव के नाम पर विजयराघवगढ़ रखा था तथा अपनी कुल देवी शारदा माई के अलावा जगह – जगह भगवान राम के मंदिर भी बनवाये थे।

झपावन नदी के तीर पर उन्होंने श्रीराम,भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के नाम पर चार कुंड भी स्थापित कराये थे। कलहरा ग्राम के समीप एक रमणीक स्थान भूमिकेश्वर धाम में भी घाट, कुंड और मंदिर का निर्माण राजा प्रयागदास द्वारा ही कराया गया था।

अयोध्या से निकलने के बाद सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम श्रंगेश्वेर पहुंचे

इतिहासकारों सहित संतो की खोजबीन और पडतालों से राम वनगमन पथ को लेकर जो तथ्य उजागर हुए थे उनके अनुसार अयोध्या से निकलने के बाद सीता और लक्ष्मण सहित श्रीराम श्रंगेश्वेर पहुंचे थे। यहां वे रथ से उतर गए थे। मंत्री सुमंत सहित उन्हें विदा करने आये अयोध्यावासी यहीं से अयोध्या वापस लौट गए थे। यहां से श्रीराम पैदल ही आगे बढ़े थे। यहीं उन्होंने राजसी वस्त्र और आभूषण का त्याग करके वल्कल धारण किया था।

उस समय निषादराज गुह श्रंगेश्वर के शासक थे। भगवान राम,सीता और लक्ष्मण कुछ समय तक निषादराज के अतिथि रहे। यह स्थान गंगा नदी के किनारे था। यहीं से केवट ने उन्हें गंगा नदी पार कराई थी।

महान ऋषि अगस्त्य ने विंध्याचल पर्वत को ऊंचा होने से रोक दिया था

प्रयागराज और वन प्रान्त में स्थित ऋषि मुनियों के आश्रम होते हुए भगवान राम चित्रकूट पहुंचे थे। श्रीराम के 12 वर्षों तक चित्रकूट में रुकने का प्रमाण विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है। चित्रकूट से आगे बढ़ते हुए श्रीराम ने विंध्याचल पर्वत पार किया। किवदंती एवं जनश्रुति के अनुसार महान ऋषि अगस्त्य ने विंध्याचल पर्वत को ऊंचा होने से रोक दिया था। उन्होंने जहां पर्वत को झुकाया था उसी स्थान का नाम झुकेही पड़ा था। चित्रकूट से रवाना हुए श्रीराम झुकेही – मैहर के सघन वन को पार करते हुए के भूमिकेश्वर धाम कलहरा पहुंचे थे। यहां से आगे की यात्रा करते हुए वे ऋषि मार्कण्डेय के आश्रम पहुंचे और वहां से शहडोल अमरकंटक होते हुए दंडकारण्य की ओर बढ़े। आगे उनके दक्षिण प्रदेशो की यात्रा का उल्लेख मिलता है।

यही मग ह्वे के गए,दंडक वन श्रीराम

विजयराघवगढ़ के अमर शहीद राजा सरयू प्रसाद के पुत्र ठाकुर जगमोहन सिंह भारतेंदु हरिश्चंद्र के मित्र थे। वे स्वयं भी एक बड़े साहित्यकार थे। ठाकुर जगमोहनसिंह ने अनेक प्रसिद्ध उपन्यासों की रचना की। उनकी एक विश्व विख्यात रचना श्यामा स्वप्न में इस बात का उल्लेख है कि माता सीता और लक्ष्मण के साथ मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम विंध्याचल पार कर इस भूमि पर पहुंचे थे। श्यामास्वप्न में उनकी पंक्तियां कुछ इस प्रकार थीं,। यही मग ह्वे के गए दंडक वन श्रीराम,,तासों पावन देश यह विंध्याटवी तमाम

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