₹10,000 से ज्यादा के ऑनलाइन ट्रांसफर पर लग सकता है 1 घंटा; फ्रॉड रोकने के लिए ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ की तैयारी
मुंबई/नई दिल्ली। देश में बढ़ते डिजिटल लेन-देन के बीच ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी (साइबर फ्रॉड) पर लगाम लगाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक बेहद कड़ा और बड़ा सुरक्षा कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। आरबीआई ने एक नया प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत यदि कोई ग्राहक ₹10,000 से अधिक का ऑनलाइन ट्रांसफर (UPI, IMPS या NEFT) करता है, तो उस पेमेंट को पूरा होने में एक घंटे का समय (कूलिंग-ऑफ पीरियड) लग सकता है।
आरबीआई के इस प्रस्ताव का भारतीय बैंकिंग उद्योग ने समर्थन तो किया है, लेकिन साथ ही आम जनता की रोजमर्रा की असुविधा और आपातकालीन स्थितियों को लेकर कुछ जायज चिंताएं भी जताई हैं।
1. ₹10,000 से ज्यादा के ट्रांसफर पर ‘1 घंटे’ का पड़ाव
आरबीआई द्वारा जारी डिस्कशन पेपर के अनुसार, यदि कोई व्यक्तिगत ग्राहक, प्रोपराइटर या पार्टनरशिप फर्म ₹10,000 से ज्यादा का डिजिटल भुगतान शुरू करती है, तो ट्रांजैक्शन पूरा होने से पहले एक घंटे की देरी (Hold) लागू होगी।
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क्यों लिया जा रहा यह फैसला: इसका मुख्य उद्देश्य ‘ऑथराइज्ड पुश पेमेंट’ (APP) फ्रॉड को रोकना है, जहां जालसाज डरा-धमकाकर या लालच देकर तुरंत पैसे ट्रांसफर करवा लेते हैं। 1 घंटे की यह देरी ग्राहकों को सोचने और संभलने का मौका देगी।
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बैंकों की चिंता: बैंकों का कहना है कि यह नियम पूरी तरह व्यावहारिक नहीं है। उदाहरण के लिए, यदि कोई ग्राहक दुकान से ₹10,000 से महंगा मोबाइल खरीद रहा है, तो वह भुगतान क्लियर होने के लिए दुकान पर एक घंटे तक इंतजार नहीं कर सकता। इसलिए नियम में लचीलापन जरूरी है।
2. बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए ‘ट्रस्टेड पर्सन’ की मंजूरी
70 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांग व्यक्तियों के पैसों को सुरक्षित रखने के लिए आरबीआई ने एक और विशेष व्यवस्था सुझाई है:
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मंजूरी अनिवार्य: यदि कोई बुजुर्ग या दिव्यांग व्यक्ति ₹50,000 से अधिक का डिजिटल ट्रांजैक्शन करता है, तो भुगतान पूरा होने से पहले उनके द्वारा तय किए गए किसी ‘ट्रस्टेड पर्सन’ (भरोसेमंद व्यक्ति) की अतिरिक्त मंजूरी जरूरी होगी।
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24 घंटे का कूलिंग पीरियड: यदि इस भरोसेमंद व्यक्ति को बदला जाता है, तो किसी भी धोखाधड़ी से बचने के लिए 24 घंटे का अनिवार्य कूलिंग-ऑफ पीरियड लागू होगा।
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व्यावहारिक चुनौती: बैंकों का तर्क है कि यदि कोई बुजुर्ग अस्पताल में आपातकालीन (Emergency) भुगतान कर रहा है और उसका नामांकित व्यक्ति (बेटा या बेटी) उस समय उपलब्ध नहीं है, तो इस नियम के कारण इलाज में देरी हो सकती है जो जानलेवा साबित हो सकती है।₹10,000 से ज्यादा के ऑनलाइन ट्रांसफर पर लग सकता है 1 घंटा; फ्रॉड रोकने के लिए ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ की तैयारी
3. बैंकों पर बढ़ेगा भारी-भरकम खर्च का बोझ
इस नए सुरक्षा तंत्र को लागू करने के लिए बैंकों को अपने मौजूदा डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े बदलाव करने होंगे:
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तकनीकी बदलाव: बैंकों को नई ट्रांजैक्शन कतारें (क्यू) बनानी होंगी और कूलिंग-ऑफ विंडो के दौरान ट्रांजैक्शन कैंसिल करने की सुविधा को नए सिरे से कोड करना होगा, जिसमें भारी लागत आएगी।
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वित्तीय दबाव: बैंक पहले से ही यूपीआई (UPI) पर जीरो-मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के कारण वित्तीय दबाव झेल रहे हैं। डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम को बनाए रखने के लिए सालाना लगभग ₹10,000 करोड़ के निवेश की आवश्यकता होती है, जिसका बड़ा हिस्सा बैंक खुद उठा रहे हैं।
वैश्विक अनुभव बनाम भारतीय हकीकत: आरबीआई ने यह प्रस्ताव ब्रिटेन, सिंगापुर, स्वीडन और अमेरिका जैसे देशों के अनुभवों को देखकर तैयार किया है। फिलहाल आरबीआई ने इस पर सभी पक्षों से राय मांगी है और बैंक उम्मीद कर रहे हैं कि अंतिम गाइडलाइंस में डिजिटल सुरक्षा के साथ-साथ आम ग्राहकों की सुविधा और स्पीड का भी पूरा संतुलन बिठाया जाएगा।
