karnataka election 2018: बीजेपी-कांग्रेस और दूसरे दलों के लिए फेसबुक बना मुसीबत..!

नेशनल डेस्क। कैंब्रिज एनालिटिका की करतूतों का खुलासा होने पर दुनिया भर में इस बात को लेकर चिंता जतायी जा रही है कि डेटा फर्म्स निजी सूचनाओं की गोपनीयता में सेंधमारी कर रहे हैं, लेकिन कर्नाटक में नजारा कुछ दूसरा है.
आइए जानते हैं क्या है कर्नाटक चुनाव में सोशल मीडिया का हाल.

दरअसल, चुनावी प्रबंधन की सेवा मुहैया करा रही एजेंसियों का कहना है कि चुनाव प्रचार के अभियान में सोशल मीडिया उपयोगी साबित नहीं हो रहा.

बेंगलुरु में कायम 5Forty3 Datalabs के कारपोरेट कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट येश्मा नन्जप्पा का कहना है कि भारत के सियासी माहौल में सोशल मीडिया का इस्तेमाल पूर्वानुमानों से जुड़े किसी विश्लेषण के लिए उपयोगी नहीं है क्योंकि 70 फीसद भारत सोशल मीडिया के रडार से बाहर है.

येश्मा ने कह भी कहा कि ‘आज के वक्त और माहौल में डेटा और एनालिटिक्स के इस्तेमाल से बचा नहीं जा सकता और एक बार यह सिलसिला शुरू हो गया तो इसे फिर से पलटकर पुरानी जगह पर नहीं लाया जा सकता. सोशल मीडिया के डेटा लीक्स के जुड़ी अधिकतर बहसें किसी मजाक से ज्यादा नहीं हैं.

एक फर्म का नाम है Pollltics.in जो चुनावों के प्रबंधन से जुड़ी खास सेवाएं मुहैया कराती है. इस फर्म के सीईओ और कैंपेन से जुड़े मामलों के मुखिया अभिषेक शुक्ला कहना है कि हम लोग प्राथमिक स्रोतों (फर्स्टहैंड सोर्सेज) से डेटा जुटाते हैं यानी घर-घर जाकर सर्वे किया जाता है और इसके आधार पर आंकड़ों का संग्रह होता है, सोशल मीडिया के प्लेटफार्म का इस्तेमाल सिर्फ अपने ग्राहक के प्रोफाइल को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है.

लेकिन कर्नाटक में राजनीतिक दल सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक सियासी औजार के रूप में कर रहे हैं और इसके सहारे ये दल फेक न्यूज और गुमराह करने वाली सूचनाओं की काट करने के जतन में लगे हैं. अभिषेक शुक्ला ने बताया कि बीजेपी समेत भारत के बहुत से राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवारों को आदेश दे रखा है कि वे सोशल मीडिया पर एक्टिव रहें.

शुक्ला का कहना है कि ‘दरअसल आजकल की एक बड़ी दिक्कत तो ये है कि सोशल मीडिया किसी जादुई मंत्र की तरह हो गया है. हर उम्मीदवार चाहता है कि उसका सोशल मीडिया कैंपेन बड़े अच्छे तरीके से चलाया जाए और हमलोग उम्मीदवारों की इस सिलसिले में भी मदद करते हैं.’

शुक्ला बताते हैं कि हमलोग उम्मीदवार को एक छोटे से दायरे में बढ़ावा देने के मकसद से काम करते हैं और जमीनी स्तर के हालात के विश्लेषण में सोशल मीडिया का डेटा बहुत कारगर नहीं है.’ शुक्ला ने बताया कि खास तरह के मतदाताओं के रुझान और मांग के हिसाब वे लोग किसी स्थिति को उभारने में उम्मीदवार की मदद करते हैं, उम्मीदवार के लिए सकारात्मक संदेश तैयार किए जाते हैं जबकि उसके विपक्षी के लिए नकारात्मक संदेश.







