पश्चिम बंगाल में सत्ता बदलते ही बड़ा उलटफेर: 2 दशक बाद 1 अगस्त को कोलकाता लौट रहीं लेखिका तस्लीमा नसरीन; सुरक्षा का जिम्मा अब CM शुभेंदु अधिकारी के हाथों
कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की सियासत में तख्तापलट होने के बाद अब सूबे की प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। वामपंथी (लेफ्ट) सरकार के दौर में कट्टरपंथियों के हिंसक विरोध और सुरक्षा कारणों से करीब 20 साल पहले कोलकाता छोड़ने को मजबूर हुईं बांग्लादेश की विश्व प्रसिद्ध और बेबाक लेखिका तस्लीमा नसरीन आखिरकार 2 दशक लंबे निर्वासन के बाद वापस अपने पसंदीदा शहर लौट रही हैं। वह आगामी 1 अगस्त 2026 को कोलकाता में आयोजित एक भव्य साहित्यिक कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से शामिल होंगी।पश्चिम बंगाल में सत्ता बदलते ही बड़ा उलटफेर: 2 दशक बाद 1 अगस्त को कोलकाता लौट रहीं लेखिका तस्लीमा नसरीन; सुरक्षा का जिम्मा अब CM शुभेंदु अधिकारी के हाथों
‘रवींद्र सदन’ में सजेगी महफिल; खुद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी होंगे शामिल
तस्लीमा नसरीन की इस बहुप्रतीक्षित वापसी को लेकर कोलकाता के सांस्कृतिक और राजनैतिक गलियारों में हलचल तेज है:
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भव्य आयोजन: कोलकाता के प्रतिष्ठित रवींद्र सदन सांस्कृतिक केंद्र में ‘सेकुलर मिशन’, ‘पश्चिमबोंगेर जोन्नो’ (पश्चिम बंगाल के लिए) और ‘ह्यूमन राइट्स बियॉन्ड फ्रंटियर्स’ द्वारा संयुक्त रूप से इस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।
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CM का सुरक्षा कवच: आयोजक उस्मान मलिक (कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील और राज्य सरकार के यूसीसी पैनल के सदस्य) ने बताया कि उन्होंने खुद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से संपर्क किया था, जिन्होंने लेखिका को फुल-प्रूफ सुरक्षा व्यवस्था का लिखित भरोसा दिया है। इस कार्यक्रम में खुद मुख्यमंत्री और मशहूर लेखक शीर्षेंदु मुखोपाध्याय भी मंच साझा करेंगे।
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कविता और दर्द का सफर: कार्यक्रम में नसरीन की बंगाली कविताएं और गाने पेश किए जाएंगे, साथ ही वह अपने निर्वासन के उस दर्दनाक दौर को भी साझा करेंगी जिसने उन्हें कोलकाता से दूर कर दिया था।
“लेफ्ट-ममता राज में नहीं मिली सुरक्षा, अब तय हो रही जवाबदेही”: मंत्री अग्निमित्रा पॉल
तस्लीमा नसरीन की वापसी पर पश्चिम बंगाल सरकार की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने पूर्ववर्ती सरकारों पर तीखा हमला बोला है। बात करते हुए उन्होंने कहा:
“हमारी सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबकी जवाबदेही’ के मंत्र पर चल रही है। वामपंथी सरकार ने मुसलमानों के नाम पर घटिया राजनीति तो की, लेकिन तस्लीमा जैसी महान लेखिका को सुरक्षा नहीं दे सकी। ममता बनर्जी के तानाशाही दौर की तो बात ही छोड़ दीजिए, वहां भी तुष्टिकरण चरम पर था। अब राज्य में कानून का राज है। मैं व्यक्तिगत रूप से उनकी किताबों की बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ और उनका स्वागत करती हूँ।”
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फ्लैशबैक: क्यों 20 साल पहले लहूलुहान हुआ था कोलकाता और बैन हुई थी ‘द्विखंडितो’?
तस्लीमा नसरीन का विवादों से चोली-दामन का साथ रहा है, जिसके कारण उन्हें अपना वतन और फिर कोलकाता छोड़ना पड़ा:
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‘लज्जा’ से मिली वैश्विक पहचान: 1993 में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हुए अत्याचारों पर आधारित उनके उपन्यास ‘लज्जा’ के कारण मौलवियों ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया था, जिसके बाद 1994 में उन्होंने बांग्लादेश छोड़ दिया।
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कोलकाता बना दूसरा घर: बंगाली संस्कृति से जुड़ा होने के कारण उन्होंने कोलकाता को अपना घर बनाया। लेकिन 2003 में जब उनकी आत्मकथा का दूसरा भाग ‘द्विखंडितो’ (स्प्लिट: ए लाइफ) आया, तो धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप लगे।पश्चिम बंगाल में सत्ता बदलते ही बड़ा उलटफेर: 2 दशक बाद 1 अगस्त को कोलकाता लौट रहीं लेखिका तस्लीमा नसरीन; सुरक्षा का जिम्मा अब CM शुभेंदु अधिकारी के हाथों
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लेफ्ट सरकार का बैन और हिंसक प्रदर्शन: तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य की वामपंथी सरकार ने सांप्रदायिक तनाव के डर से किताब पर बैन लगा दिया था (जिसे 2005 में हाई कोर्ट ने हटा दिया)। इसके बाद 2006 में टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम ने नसरीन का मुंह काला करने वाले को इनाम देने की घोषणा की। 2007 में हुए भारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें सुरक्षा कारणों से आधी रात को कोलकाता छोड़ना पड़ा था।
40 से अधिक किताबों की रचनाकार
बंगाली भाषा में महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता, पितृसत्ता और घरेलू हिंसा के खिलाफ बेबाकी से लिखने वाली तस्लीमा नसरीन ने 40 से अधिक किताबें लिखी हैं, जिनका दुनिया की 30 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। अब करीब 20 साल बाद जब बंगाल की धरती पर उनकी दोबारा एंट्री हो रही है, तो इसे राज्य की नई राजनैतिक दिशा और अभिव्यक्ति की आजादी के नए युग के रूप में देखा जा रहा है।
