‘थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी’ पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी जंग: केंद्र-CBSE ने किया नीति का बचाव; अचानक नियम थोपने पर वकीलों ने उठाए गंभीर सवाल

'थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी' पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी जंग: केंद्र-CBSE ने किया नीति का बचाव; अचानक नियम थोपने पर वकीलों ने उठाए गंभीर सवाल

‘थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी’ पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी जंग: केंद्र-CBSE ने किया नीति का बचाव; अचानक नियम थोपने पर वकीलों ने उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली: देश भर के माध्यमिक स्कूलों में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत ‘थ्री-लैंग्वेज फ्रेमवर्क’ (त्रि-भाषा फॉर्मूला) को अनिवार्य रूप से लागू करने का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंच गया है। केंद्र सरकार, सीबीएसई (CBSE) और एनसीईआरटी (NCERT) ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर इस नीति का पुरजोर बचाव किया है। उन्होंने साफ कहा है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में ‘मल्टीलिंगुअलिज्म’ (बहुभाषावाद) और ‘नेशनल इंटीग्रेशन’ (राष्ट्रीय एकता) को बढ़ावा देने के लिए यह कदम बेहद जरूरी है।

 सुप्रीम कोर्ट सख्त: केंद्र और CBSE से 10 दिनों में मांगा जवाब, 29 जुलाई को अगली सुनवाई

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने बोर्ड की इस पॉलिसी को चुनौती देने वाली दो नई याचिकाओं पर सुनवाई की:

क्या है पूरा विवाद? 9वीं के छात्रों के लिए 2 भारतीय भाषाएं अनिवार्य

दरअसल, सीबीएसई के एक हालिया सर्कुलर के मुताबिक, 1 जुलाई से कक्षा 9वीं के छात्रों के लिए कम से कम दो मूल भारतीय भाषाओं (Native Indian Languages) सहित तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया है।

 वकीलों की तीखी दलील: “अचानक भाषा थोप दी, न किताबें हैं न शिक्षक!”

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश देश के दिग्गज वकीलों— सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी, आनंद ग्रोवर और गोपाल शंकरनारायणन— ने कोर्ट के सामने छात्रों और अभिभावकों की व्यावहारिक दिक्कतों का पुलिंदा रख दिया: ‘थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी’ पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी जंग: केंद्र-CBSE ने किया नीति का बचाव; अचानक नियम थोपने पर वकीलों ने उठाए गंभीर सवाल

आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस नीति पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है, लेकिन केंद्र और बोर्ड से कड़े सवाल पूछे हैं। अब 29 जुलाई को होने वाली सुनवाई बेहद निर्णायक होगी, जिससे यह साफ होगा कि देश के लाखों छात्रों को इसी सत्र से तीसरी भाषा पढ़नी होगी या फिर कोर्ट बुनियादी ढांचे की कमी को देखते हुए सरकार को कोई रियायत देने का निर्देश देगा।

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