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वंदे मातरम्…’ के कुछ शब्द में होना चाहिए बदलाव-लोकसभा स्पीकर

इंदौर। बंकिमचंद्र चटोपाध्याय की रचना ‘वंदे मातरम्” के कुछ शब्द लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने बदलने पर जोर दिया है। गांधी हॉल इंदौर में शनिवार को संसदीय कार्य मंत्रालय की चित्रकला प्रदर्शनी के दौरान गायिका ने वंदे मातरम्… गाया तो महाजन ने अपने भाषण में कहा कि अब षष्ठीकोटि कंठ के बजाय कोटि-कोटि कंठ शब्द का इस्तेमाल होना चाहिए।

सुमित्रा महाजन

इसके बाद गायिका ने ताई से माफी मांगते हुए भविष्य में इस बात का ध्यान रखने की बात कही। वंदे मातरम् को लेकर लोकसभा स्पीकर की टिप्पणी चर्चा में है।

देश का राष्ट्रगान ‘जन गण मन…” है। कई आयोजनों की शुरुआत में ‘वंदे मातरम…” भी गाया जाता है। इसे लेकर अकसर विवाद भी उठते रहे हैं। वर्ष 1905 में वाराणसी में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में वंदे मातरम् गाया गया था। कुछ मुस्लिम संगठन इस पर आपत्ति भी जता चुके हैं। अब लोकसभा स्पीकर ने राष्ट्रगीत में बदलाव का जिक्र कर फिर ध्यान खींचा है।

संपूर्ण वंदे मातरम् गाने पर होती है त्रुटि

‘जब भी संपूर्ण वंदे मातरम् गाया जाता है तो त्रुटि होती है। अब षष्ठीकोटि के आगे निकल गए हैं। कोटि-कोटि हो गए हैं, इसलिए गाते समय भी कोटि-कोटि शब्द बोला जाना चाहिए। जिस भारत मां के लिए गा रहे हैं, अब उसका आज का खाका भी देखने की जरूरत है। इसलिए षष्ठीकोटि शब्द समसामयिक नहीं रहा।”

-सुमित्रा महाजन, लोकसभा स्पीकर

गीत की रचना के समय छह करोड़ थी देश की आबादी

वर्ष 1882 में प्रकाशित बंकिमचंद्र के प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में वंदे मातरम् रचना शामिल थी। गीत जब लिखा गया था तो देश की आबादी छह करोड़ थी, इसलिए षष्ठीकोटि कंठ कल-कल निनाद कराले, (छह करोड़ कंठों की जोशीली आवाज) द्विषष्ठि कोटि-भुजै धृत खरकरवाले (12 करोड़ भुजाओं में तलवारों को धारण किए हुए) लाइन में तब की आबादी का जिक्र किया गया था। – – डॉ. मुरलीधर चांदनीवाला, संस्कृत साहित्यकार

Ashutosh shukla

30 वर्षों से निरन्तर सकारात्मक पत्रकारिता, संपादक यशभारत डॉट काम

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