दिग्विजय की एकता यात्रा के मायने, प्रदेश में नए सिरे से बिछा रहे दिग्गी अपनी बिसात
जबलपुर। 2003 के पहले तक प्रदेश की राजनीति में यदि कोई नाम लिया जाता था तो वह दिग्विजय सिंह का था। लम्बे समय तक प्रदेश की राजनीति की धूरी लम्बे समय तक दिग्विजय सिंह के इर्द-गिर्द घूमती रही।
लेकिन 2003 के विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद दिग्विजय सिंह ने प्रदेश की राजनीति से दूरी बना ली और केन्द्र की तरफ चले गए थे। उसके बाद चुनावों या किसी खास मौकों पर ही उनकी उपस्थिति प्रदेश में दर्ज होती थी लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में दिग्विजय की खासी सक्रियता देखने को मिल रही है।
नर्मदा यात्रा के व्यक्तिगत धार्मिक आयोजन के बाद वे पूरी ताकत के साथ प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हो गए हैं जिसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने जिस धुरी से अपने राजनैतिक कैरियर की शुरूआत की थी वे उसी नब्ज को एक बार फिर पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
पिछले तीन दिनों से दिग्विजय सिंह की जबलपुर में मौजूदगी वैसे तो चुनावी समय में एक सामान्य प्रवास के रूप में देखा जा सकता है लेकिन इसे राजनीति के विश्लेषक ग्रास रूट एक बार फिर केन्द्र तक पहुंचने की कवायद के रूप में देख रहे हैं।
उनकी राजनीति का एक अलग ही मिजाज रहा है। लेकिन इस बार एक एक कार्यकर्ता से व्यक्तिगत रूप से जाकर मिलना और फिर उसकी बातों को समझकर कांग्रेस के मिजाज को समझने की जो कोशिश चल रही है वह दिग्विजय की प्रारंभिक राजनीति की पहचान थी। जो धीरे-धीरे सत्ता तक पहुंचते-पहुंचते कहीं खो सी गई थी।
सत्ता में रहते लोगों से सतत संपर्क बनाए रखना और अपने लोगों को हमेशा आगे रखना उनकी पहचान रही। लेकिन 2001 के बाद से उनके अंदाज में आया परिवर्तन उन्हें बहुत पीछे ले गया।
कांग्रेस में अक्सर देखा जाता है कि बैठक शुरू होने से पहले ही बैठक के विमर्श शुरू हो जाते हैं और परिणाम आ जाते हैं लेकिन इस बार न जाने दिग्विजय अपने वन टू वन में नेताओं को कौन सी घुट्टी पिला रहे हैं कि जो बात करके आते हैं वह बैठक के पहले तो छोड़ो बैठक के बाद भी बाहर नहीं आ रही है।
यदि एक बड़े परिदृश्य में दिग्विजय सिंह की इस भूमिका को देखें तो यह प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और चुनाव अभियान समिति के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया से इतर ही देखी जा रही है। क्योंकि सिंधिया एक ग्लैमरस चेहरा हैं और कमलनाथ को लेकर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं में एक आकर्षण सा रहता है जो भीड़ खींचने के साथ साथ माहौल भी बनाते हैं।
लेकिन चुनाव नजदीक आने के बाद भी ये अपनी यूएसबी का उपयोग नहीं कर रहे हैं। वहीं अपने बयानों और केन्द्र में सक्रियता के चलते प्रदेश की राजनीति में पिछड़ गए दिग्विजय सिंह जिस अंदाज में वापसी कर रहे हैं उसके संकेत समझने की आवश्यकता है क्योंकि राजनीति में जो इशारों को समझ पाता है वह ही आगे निकलता है।

