MPPSC प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम घोषित करने पर रोक हटी
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने एमपी पीएससी प्रारंभिक परीक्षा-2018 के परिणाम घोषित करने पर पूर्व में अंतरिम आदेश के जरिए लगाई गई रोक शुक्रवार को वापस ले ली।
यह कदम इस टिप्पणी के साथ उठाया गया कि महज 3 छात्रों की अपील पर 2 लाख 34 हजार छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं कर सकते। हालांकि यह व्यवस्था अवश्य दी जाती है कि पीएससी प्रारंभिक परीक्षा-2018 के परिणाम विचाराधीन याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगे। न्यायमूर्ति सुजय पॉल की एकलपीठ ने उक्त अंतरिम आदेश के साथ ही मामले की अगली सुनवाई 19 अप्रैेल को निर्धारित कर दी।
उल्लेखनीय है कि जस्टिस वंदना कासरेकर की एकलपीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद पीएससी प्रारंभिक परीक्षा-2018 के परिणाम पर रोक लगा दी थी। साथ ही पीएससी को नोटिस जारी कर जवाब-तलब कर लिया था। पीएससी की ओर से गुरुवार को अपना जवाब पेश किया गया। जिसके संदर्भ में शुक्रवार को याचिकाकर्ता ने अपना जवाब पेश किया। दोनों जवाबों को रिकॉर्ड पर लेकर हाई कोर्ट ने पूर्व में लगाई रोक हटा दी।
यह है मामला
याचिकाकर्ता सुदीप सिंह सहित तीन छात्रों की ओर से अधिवक्ता प्रियंकुश जैन ने दलील दी कि 18 फरवरी-2018 को आयोजित पीएससी प्रारंभिक परीक्षा की मॉडल आंसरशीट में गड़बड़ी सामने आई है। लिहाजा रिजल्ट घोषित किए जाने पर अविलंब रोक अपेक्षित है।
सुनवाई के दौरान एमपी पीएससी की ओर से अधिवक्ता सीमा शर्मा ने जवाब पेश करने के लिए समय दिए जाने की मांग की। कोर्ट ने यह मांग मंजूर करते हुए अगली सुनवाई 5 अप्रैल को निर्धारित कर दी। इस बीच रिजल्ट घोषित किए जाने पर रोक लगा दी गई है।
ऑनलाइन आपत्तियां मंगवाने के बाद और बड़ी गलती
बहस के दौरान अधिवक्ता प्रियंकुश जैन ने साफ किया कि 18 फरवरी को परीक्षा के बाद 21 फरवरी को मॉडल आंसरशीट प्रकाशित की गई। उसके संबंध में आवेदकों की आपत्तियां आमंत्रित की गईं। लिहाजा, 2 लाख से अधिक आवेदकों ने ऑनलाइन आपत्तियां प्रस्तुत कीं।
सभी आपत्तियों पर गौर करने के बाद 12 मार्च 2018 को फाइनल मॉडल आंसरशीट प्रकाशित कर दी गई। इस फाइनल मॉडल आंसरशीट में पहले से अधिक गलतियां की गईं। सवालों के सही जवाब तक गलत कर दिए गए।
एनएच-3 मध्यप्रदेश के किस शहर से गुजरता है, इस प्रश्न के उत्तर में चारों शहर मध्यप्रदेश के दर्शाए गए, जबकि चौथा विकल्प यह होना था कि इनमें से कोई नहीं। इसके अलावा प्रश्नपत्रों के चार सेट के संबंध में भी कई तरह की अनियमितताएं सामने आईं। इसलिए हाई कोर्ट की शरण ली गई।