Weather Record: 1989 में दिल्ली में पड़ा था 48 डिग्री तापमान, तब नहीं मचा था इतना हाहाकार; जानिए आज 43°C पर ही क्यों मचा है त्राहिमाम?
नई दिल्ली : देश की राजधानी दिल्ली और इसके आस-पास के इलाकों में इन दिनों सूरज आग उगल रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मुताबिक, बीते सोमवार को दिल्ली में 43.5°C तापमान दर्ज किया गया, जिसने झुलसाने वाली गर्मी से राजधानी वासियों का हाल बेहाल कर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले साल 2012 में भी मई के महीने में ठीक इतना ही (43.5°C) तापमान रिकॉर्ड किया गया था।
मौसम विभाग का अनुमान है कि ‘नौतपा’ के चलते अगले कुछ दिनों तक दिल्ली-एनसीआर का पारा 43 से 44 डिग्री सेल्सियस के बीच ही बना रहेगा। आसमान में बादलों का नामोनिशान नहीं है और न ही ठंडी हवाओं की कोई उम्मीद। इस भीषण तपिश के बीच लोग घरों-दफ्तरों में एयर कंडीशनर (AC) तो चला रहे हैं, लेकिन हर गुजरते साल के साथ गर्मी को बर्दाश्त करने की इंसानी क्षमता जवाब देती जा रही है।
क्या वाकई हर साल बढ़ रही है गर्मी? आंकड़े दे रहे हैं गवाही
हर साल मई से जुलाई के बीच जब देश तपता है, तो आम तौर पर लोगों को यही लगता है कि “पिछले साल के मुकाबले इस साल ज्यादा गर्मी पड़ रही है।” लेकिन अगर हम मौसम विभाग के पिछले सालों के रिकॉर्ड को खंगालें, तो आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।
बहुत कम लोगों को याद होगा कि 4 जून 1989 को दिल्ली का अधिकतम तापमान 48°C दर्ज किया गया था, जो आज के मुकाबले कहीं ज्यादा था। आंकड़ों से साफ है कि तापमान का स्तर तकरीबन बीते दशकों के आस-पास ही घूम रहा है, लेकिन हमारी बेचैनी और चिड़चिड़ाहट साल दर साल बढ़ती जा रही है।
घर, कार, मेट्रो और दफ्तर: ‘एसी’ ने घटाई हमारी सहनशक्ति
आखिर ऐसा क्यों है कि पहले के मुकाबले कम तापमान पर भी आज लोग ‘त्राहिमाम’ कर रहे हैं? इसका सीधा जवाब है हमारी बदलती जीवनशैली।
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कूलर से एसी का सफर: दिल्ली में मेट्रो नेटवर्क फैलने और आधुनिक सुख-सुविधाएं बढ़ने से पहले, अधिकांश घरों में कूलर हुआ करते थे। लोग डीटीसी (DTC) की सामान्य बसों में सफर करते थे और उनका शरीर प्राकृतिक रूप से मौसम के अनुकूल ढल जाता था।
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लगातार कूलिंग का असर: आज आम इंसान घर से निकलता है तो कार या कैब में एसी, सफर के लिए एसी मेट्रो, दफ्तर में सेंट्रलाइज्ड एसी और वापस घर लौटने पर फिर से एसी की हवा में रहता है। इस ‘लगातार कृत्रिम ठंडक’ में रहने के कारण जैसे ही हम कुछ मिनटों के लिए भी बाहर निकलते हैं, जरा सी धूप शरीर को काटने लगती है और गर्म हवा से बदन उबलने लगता है।
कामकाजी मजबूरी और गिरती इम्यूनिटी (Immunity)
आज की कॉर्पोरेट और कामकाजी जिंदगी में उत्पादकता (Productivity) बढ़ाने का भारी दबाव है। मशीनों और तकनीक के साथ कदमताल करने के लिए इंसान को भी कूल माहौल की जरूरत होती है ताकि वह तेजी से काम कर सके। इस लिहाज से एयर कंडीशनर आज की जरूरत बन चुका है, लेकिन इसकी एक भारी कीमत हमारा शरीर चुका रहा है।
एसी के अत्यधिक इस्तेमाल से सेहत पर असर:
इम्यूनिटी सिस्टम का कमजोर होना: प्राकृतिक धूप और ताजी हवा हमारे शरीर के रोग प्रतिरोधक तंत्र (Immunity) को मजबूत रखती है, जिससे हम दूर हो चुके हैं।
शारीरिक समस्याएं: एसी की ज्यादा आदत से त्वचा का रूखापन (Dry Skin), हड्डियों और जोड़ों में दर्द, बालों का झड़ना और मांसपेशियों में खिंचाव जैसी दिक्कतें तेजी से बढ़ रही हैं।
पर्यावरण को दोहरा नुकसान
यह एक कड़वा सच है कि आज के समय में मई-जून की गर्मी बिना एयर कंडीशनर के काटना नामुमकिन सा हो गया है। लेकिन हम जितना ज्यादा एसी का इस्तेमाल करते हैं, उससे निकलने वाली गैसें बाहरी पर्यावरण को उतना ही ज्यादा गर्म करती हैं। सघन होती कॉलोनियां और कंक्रीट के जंगल जरा सी बत्ती गुल होने पर लोगों को डिप्रेशन और टेंशन में डाल देते हैं।
तापमान भले ही पुराने सालों जैसा हो, लेकिन एसी की लत ने हमारी सहनशक्ति को इस कदर प्रभावित किया है कि अब यह मौसम बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है।

