RSS के सख्त रुख से बीजेपी के लिए सिरदर्द बना केरल में नए अध्यक्ष का चुनाव
नेशनल डेस्क। केरल के हालिया घटनाक्रम में ऐसा लग रहा था किकांग्रेस द्वारा राज्यसभा की सीट कांग्रेस (मणि) को दिए जाने से पड़ी फूट का फायदा बीजेपी उठा सकती है. लेकिन राज्य में बीजेपी प्रमुख को लेकर आरएसएस से चल रही खींचतान के चलते बीजेपी के हाथों से ये मौका निकल दिख रहा है.
ये सारी जद्दोजहद तब शुरू हुई जब राष्ट्रपति ने कुम्मानम राजशेखर को मिज़ोरम का गवर्नर बनाने का नोटीफिकेशन जारी किया. राजशेखरन लंबे समय से आरएसएस के प्रचारक रहे हैं और वो राज्य छोड़कर जाना नहीं चाहते थे. अब राज्य इकाई के प्रमुख का पद खाली होते ही बीजेपी के सामने नया प्रमुख चुनने की समस्या खड़ी हो गई.
केरल बीजेपी में आपसी मतभेद और मुरलीधरन के पद छोड़ने से 2015 में पैदा हुए खालीपन को भरने के लिए बीजेपी ने संघ को मध्यस्थता करने के लिए कहा. उस समय संघ ने राजशेखरन को केरल बीजेपी का प्रमुख बना दिया. शर्त थी कि वो कम से कम दो साल तक इस पद पर बने रहेंगे.
अब संघ चाह रही है कि बीजेपी ऐसे नेता का चुनाव करे जिसकी स्वीकार्यता संघ के लिए भी हो. जनसंघ के समय में ये काम काफी आसान होता, क्योंकि जनसंघ और आरएसएस एक दूसरे के अनुसार काम करते थे. लेकिन जनता दल में विभाजन के बाद बीजेपी ने राजनीतिक रूप से अपने रास्ते में थोड़ा परिवर्तन कर लिया. हालांकि ओ राजगोपाल, के रमन पिल्लई और केजी मरार जैसे जनसंघ के नेता 90 के दशक में केरल बीजेपी के चेहरे बने रहे. पर बीजेपी और संघ के बीच का गठजोड़ थोड़ा फीका पड़ने लगा.
अब बीजेपी के फैसले संघ की विचारधारा के बजाय कहीं ज़्यादा राजनीतिक ज़रूरतों के हिसाब से लिए जाने लगे. दोनों मे मतभेद तब बिल्कुल सामने उभरकर आ गया, जब 2007 में पीके कृष्णदास को केरल बीजेपी का प्रमुख बना दिया गया, जिसकी वजह से वरिष्ठ नेता के रमन पिल्लई ने विरोध जताते हुए पार्टी छोड़ दिया.
फिर से कृष्णदास के बाद पूर्ण कालिक एबीवीपी सदस्य वी मुरलीधरन को प्रमुख बनाया जाना भी संघ को रास नहीं आया. जब मुरलीधरन का कार्यकाल पूरा हुआ तो एमटी रमेश का नाम इस पद के लिए काफी उभरकर आने लगा. लेकिन अमित शाह, जिन्होंने उस समय पार्टी प्रमुख का पद संभाला ही था, उन्होंने राय लेने के लिए केरल के कई पत्रकारों से संपर्क भी किया. पर पार्टी में आपसी मतभेद के चलते संघ ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कुम्मानम राजशेखरन को पार्टी प्रमुख बना दिया.
इस बार संघ ने जिस तरह से कड़ा रुख अपना रखा है, उससे ज़ाहिर है कि उसे मनाना आसान नहीं होगा. मीडिया में कुछ नामों पर चर्चा चल रही है लेकिन अभी तक औपचारिक रूप से कोई घोषणा नहीं की गई है. राज्य में संघ से नज़दीकी रखने वाले नेताओं का आरोप है कि राजशेखरन को मिज़ोरम का गवर्नर बना कर उनका ‘पनिशमेंट ट्रांसफर’ किया गया है. कुछ लोगों की मांग है कि राजशेखरन को फिर से राज्य इकाई का प्रमुख बनाया जाए.
कांग्रेस में चल रहे मतभेद के चलते केरल में वर्तमान परस्थितियां बीजेपी के पक्ष में हैं. माना जा रहा है चेंगन्नूर उपचुनाव में हार के बाद केरल कांग्रेस को राज्यसभा सीट दिया जाना अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के मद्देनज़र किया गया है. आईयूएमएल और केरल कांग्रेस के बीच बढ़ रही दरार का फायदा बीजेपी ले सकती थी लेकिन बीजेपी के सामने खुद ही नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. केरल में बीजेपी के पास किसी मज़बूत आवाज़ का न होना न सिर्फ पार्टी के लिए नुकसानदायक हो सकता है बल्कि इसका फायदा सीपीएम को भी मिल सकता है.


