RBI Compounds FEMA Case: फेमा नियम तोड़ने पर फंसी इस कंपनी को रिजर्व बैंक से मिली बड़ी राहत-ED की ‘नो ऑब्जेक्शन’ के बाद जुर्माना भरकर निपटाया मामला

RBI Compounds FEMA Case: फेमा नियम तोड़ने पर फंसी इस कंपनी को रिजर्व बैंक से मिली बड़ी राहत-ED की 'नो ऑब्जेक्शन' के बाद जुर्माना भरकर निपटाया मामला

RBI Compounds FEMA Case: फेमा नियम तोड़ने पर फंसी इस कंपनी को रिजर्व बैंक से मिली बड़ी राहत-ED की ‘नो ऑब्जेक्शन’ के बाद जुर्माना भरकर निपटाया मामला

मुंबई: विदेशी निवेश के नियमों और फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (FEMA) के जाल में फंसी एक बड़ी कंपनी के लिए राहत की खबर है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने फेमा नियमों के उल्लंघन के एक गंभीर मामले में ‘राइप अकाउंटेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड’ (Ripe Accountancy Services Pvt Ltd) कंपनी को बड़ी राहत देते हुए उसके खिलाफ चल रही सभी कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाइयों को समाप्त कर दिया है। Katni Industrial Crackdown: कटनी में प्रदूषण फैलाने वाली कंपनी पर बड़ी गाज- ‘मेसर्स प्रेस्टीज व्हीकल’ को तुरंत बंद करने का आदेश; बिजली काटने और सरकारी सुविधाएं छीनने के निर्देश

प्रवर्तन निदेशालय (ED) से हरी झंडी मिलने के बाद रिजर्व बैंक ने एक कंपाउंडिंग आदेश जारी कर इस पूरे विवाद पर हमेशा-हमेशा के लिए विराम लगा दिया है.

आखिर क्या था पूरा मामला और ED की जांच में क्या खुला?

यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब देश की प्रीमियर जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस कंपनी के विदेशी निवेश (Foreign Investment) से जुड़े लेनदेन की गहनता से जांच की:

कंपनी ने मानी अपनी गलती, RBI से लगाई गुहार

जांच में अनियमितताएं सामने आने के बाद मामला पूरी तरह से कोर्ट-कचहरी में जाने के बजाय आरबीआई के समक्ष कंपाउंडिंग (Compounding) के लिए भेजा गया।

 ED के ‘नो ऑब्जेक्शन’ के बाद 1.77 लाख में छूटी जान

आरबीआई ने इस संवेदनशील मामले पर अंतिम फैसला लेने से पहले जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) से उसकी राय और अनापत्ति प्रमाण पत्र मांगा था।

कॉरपोरेट जगत के लिए विशेषज्ञों का बड़ा संदेश

बिजनेस विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई का यह कदम यह साफ संदेश देता है कि भारत में व्यापार करने वाली कंपनियों के लिए विदेशी निवेश और फेमा (FEMA) नियमों का कड़ाई से पालन करना कितना जरूरी है। समय पर रिपोर्टिंग और दस्तावेज जमा न करने पर ईडी और आरबीआई जैसी नियामक एजेंसियां सख्त रुख अपना सकती हैं, हालांकि कंपाउंडिंग जैसी व्यवस्था से समय और साख दोनों को बचाया जा सकता है।

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