अरहर उत्पादन की ‘धारवाड़ पद्धति’ से तीन गुना तक बढ़ सकती है आय: विजयराघवगढ़ कॉलेज में विद्यार्थियों को दिया गया जैविक खेती का प्रशिक्षण

अरहर उत्पादन की ‘धारवाड़ पद्धति’ से तीन गुना तक बढ़ सकती है आय: विजयराघवगढ़ कॉलेज में विद्यार्थियों को दिया गया जैविक खेती का प्रशिक्षण
कटनी: शासकीय महाविद्यालय विजयराघवगढ़ में व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत स्नातक विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से एक विशेष जैविक कृषि तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्राचार्य डॉ. अरुण कुमार सिंह के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम में जैविक कृषि विशेषज्ञ रामसुख दुबे ने विद्यार्थियों को अरहर (तुअर) उत्पादन की आधुनिक ‘धारवाड़ पद्धति’ और जैविक खेती के विभिन्न पहलुओं का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया।
धारवाड़ पद्धति: पौध तैयार करने से लेकर भंडारण तक की प्रक्रिया
विशेषज्ञ रामसुख दुबे ने विद्यार्थियों को कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए धारवाड़ पद्धति की संपूर्ण प्रक्रिया समझाई:
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कम बीज दर व नर्सरी तैयार करना: पारंपरिक विधि की तुलना में इसमें बीज की खपत बेहद कम होती है। प्रति हेक्टेयर लगभग 2 किलोग्राम उन्नत किस्म के बीज को पॉलिथीन बैग में मिट्टी व जैविक खाद भरकर बोया जाता है। 20 से 25 दिनों में पौधा तैयार होने के बाद इसे खेत में रोपित किया जाता है।
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दूरी और पौध संख्या: इस पद्धति में कतार से कतार की दूरी 5 फीट तथा पौधे से पौधे की दूरी 3 फीट रखी जाती है, जिससे प्रति एकड़ लगभग 3,000 पौधों का रोपण होता है।
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देखभाल और प्रबंधन: प्रशिक्षण में पौधों की शीर्ष शाखाओं को छंटाई (Top Pruning), खरपतवार नियंत्रण, सिंचाई, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा वैज्ञानिक कटाई-गहाई और भंडारण की जानकारी दी गई।
तीन गुना अधिक आय का आर्थिक विश्लेषण
कृषि विशेषज्ञ ने अरहर की पारंपरिक और धारवाड़ पद्धति के बीच का आर्थिक अंतर समझाते हुए बताया:
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पारंपरिक खेती: किसानों को औसतन ₹47,350 प्रति हेक्टेयर की वार्षिक आय प्राप्त होती है।
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धारवाड़ पद्धति: इस तकनीक को अपनाने पर ₹1,24,588 प्रति हेक्टेयर तक की वार्षिक आय का आर्थिक विश्लेषण सामने आया है।
विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए बताया गया कि उन्नत एवं वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को अपनाकर खेती को एक बेहद लाभप्रद और सफल स्वरोजगार के रूप में विकसित किया जा सकता है।








