पुजारी नियुक्ति में जाति-वंश बाधा नहीं, केरल हाई कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक निर्णय
त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड अधिकारी और सेवक सेवा नियम के मुताबिक, कुछ समय के लिए मंदिर का पुजारी नियुक्त होने के लिए पात्रता होना किसी भी तांत्रिक विद्या पीठ या टीडीबी/केडीआरबी की ओर से मान्यता प्राप्त किसी भी प्रतिष्ठित संस्थान से शांति पाठ्यक्रम में सर्टिफिकेट होना था।
याचिकाकर्ताओं ने क्या दिया तर्क
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि टीडीबी और केडीआरबी के पास ‘शांति’ (मंदिर पुजारी) के पद के लिए ऐसी योग्यताएं निर्धारित करने का कोई अधिकार नहीं है. केडीआरबी और टीडीबी ने मनमाने ढंग से कुछ ‘थंथरा विद्यालयों’ को अनुभव प्रमाण पत्र जारी करने के योग्य मान लिया, जबकि उनके पास ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था और ऐसे विद्यालयों में उचित थंथरिक शिक्षा की कमी भी थी।
विरोधियों की तरफ से तर्क दिया गया कि नए नियमों ने पुरानी थंथरिक शिक्षा (विशेष धार्मिक ट्रेनिंग) को नुकसान पहुंचाया. मंदिर के थंथरियों (धार्मिक विशेषज्ञ) द्वारा पुजारियों को प्रमाणित करने की सदियों पुरानी परंपरा को बायपास कर दिया. विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि धार्मिक ग्रंथों, आगम शास्त्रों और थंथरासमुचयम (धार्मिक किताबें) कहती हैं कि पुजारी की नियुक्ति धार्मिक प्रथा है, इसलिए ये जरूरी है.

