Cancer Case in SC: कैंसर संक्रामक नहीं, इसे अधिसूचित बीमारी घोषित करना जरूरी नहीं- सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का कड़ा हलफनामा; नीतिगत मामलों में दखल न देने की अपील
नई दिल्ली: देश में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के प्रबंधन और उसे सरकारी तौर पर ‘अधिसूचित बीमारी’ (Notified Disease) की सूची में शामिल करने को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ा और कड़क विधिक पक्ष रखा है। केंद्र सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि कैंसर कोई संक्रामक रोग (Infectious Disease) नहीं है, इसलिए इसे मलेरिया, टीबी या कोरोना जैसी संक्रामक बीमारियों की तरह अनिवार्य रूप से अधिसूचित करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
दरअसल, केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता अनुराग श्रीवास्तव की रिट याचिका पर जारी नोटिस के जवाब में यह कड़ा हलफनामा दाखिल किया है.
क्या है याचिका और इस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का विन्यास?
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याचिकाकर्ता की मांग: याचिका में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से मांग की गई थी कि कैंसर को अनिवार्य रूप से देश की अधिसूचित बीमारियों की सूची में डाला जाए और इसकी निगरानी के लिए कड़े विधिक उपाय किए जाएं.
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WHO की सिफारिश का हवाला: इसके जवाब में स्वास्थ्य मंत्रालय ने अदालत को बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी संक्रामक रोगों के लिए बनाई गई अनिवार्य अधिसूचना प्रणाली के बजाय कैंसर के लिए केवल रजिस्ट्रेशन (Registry) और दीर्घकालिक महामारी विज्ञान (Epidemiology) के तहत व्यापक निगरानी की सिफारिश करता है.
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नीतिगत दखल से परहेज की अपील: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कड़ा आग्रह किया है कि वह इस प्रकार के नीतिगत और चिकित्सा-वैज्ञानिक मामलों में हस्तक्षेप न करे. सरकार के मुताबिक, देश में कैंसर रोग को प्रबंधित और ट्रैक करने के लिए जो मौजूदा तंत्र काम कर रहे हैं, वे वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह उपयुक्त और संवैधानिक रूप से अनुपालन योग्य हैं.
स्वास्थ्य राज्य का विषय है- 17 राज्यों ने अपने स्तर पर किया है अधिसूचित
केंद्र सरकार ने इस विधिक लड़ाई में देश के संवैधानिक और संघीय ढांचे (Federal Structure) का विन्यास भी सामने रखा है:
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सामुदायिक प्रसार का खतरा नहीं: केंद्र ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि चूंकि कैंसर संक्रामक नहीं है, इसलिए इससे समाज में किसी भी तरह के ‘कम्युनिटी स्प्रेड’ (सामुदायिक प्रसार) का कोई खतरा पैदा नहीं होता है.
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राज्यों का अधिकार क्षेत्र: हलफनामे में स्पष्ट किया गया है कि भारतीय संविधान के अंतर्गत ‘स्वास्थ्य’ मुख्य रूप से राज्य का विषय (State Subject) है. इसलिए, किसी भी बीमारी को अधिसूचित करने या न करने संबंधी अंतिम निर्णय और विधायी अधिकार राज्य सरकारों के क्षेत्राधिकार में ही आते हैं.
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17 राज्यों का अपना फैसला: केंद्र ने बताया कि अब तक देश के 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने-अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य कानूनों या कार्यकारी आदेशों के तहत कैंसर को अपनी स्थानीय निगरानी के लिए अधिसूचित कर दिया है.
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ICMR का राष्ट्रव्यापी नेटवर्क: इसके अलावा, देश में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) द्वारा ‘राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम’ (NCRP) और संबंधित जनसंख्या-आधारित व अस्पताल-आधारित कैंसर रजिस्ट्रियों के माध्यम से देशव्यापी निगरानी का कार्य पहले से ही बहुत कड़ाई और वैज्ञानिक विन्यास से किया जा रहा है.
कैंसर की रोकथाम और मुफ्त इलाज के लिए चल रही हैं कई कड़क योजनाएं
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वस्त किया है कि अधिसूचना न होने के बावजूद कैंसर पीड़ितों के इलाज और देश में इसकी रोकथाम के लिए सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हलफनामे में सरकार की वर्तमान महत्वपूर्ण पहलों पर कड़ा प्रकाश डाला गया है:
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NP-NCD कार्यक्रम: राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग निवारण एवं नियंत्रण कार्यक्रम के तहत देश भर में कैंसर की जल्द पहचान और स्क्रीनिंग की जा रही है.
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आयुष्मान भारत (PM-JAY): इसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर करोड़ों परिवारों को कैंसर के कड़े और महंगे इलाज, कीमोथेरेपी और सर्जरी के लिए मुफ्त स्वास्थ्य बीमा कवर मिल रहा है.
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स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट: देश के विभिन्न हिस्सों में ‘राज्य कैंसर संस्थान’ और ‘तृतीयक कैंसर देखभाल केंद्र’ (Tertiary Cancer Care Centres) स्थापित किए गए हैं, जो कैंसर के अत्याधुनिक निदान और उपचार के प्रति सरकार की कड़क प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं.
