भाजपा का स्पष्ट संदेश: काम करने वालों को सम्मान, केवल जातीय राजनीति और संगठन विरोधियों के लिए नहीं बची जगह

भाजपा का स्पष्ट संदेश: काम करने वालों को सम्मान, केवल जातीय राजनीति और संगठन विरोधियों के लिए नहीं बची जगह

कटनी। भारतीय जनता पार्टी में इन दिनों ब्राह्मण और सामान्य वर्ग को लेकर नई रणनीति पर गंभीरता से काम होता दिखाई दे रहा है। दरअसल पश्चिम बंगाल में सामान्य वर्ग को साधने के प्रयोग से मिले सकारात्मक राजनीतिक परिणामों के बाद पार्टी ने यह समझ लिया है कि जातीय समीकरणों से आगे बढ़कर सामाजिक संतुलन और कार्यकर्ता आधारित राजनीति कहीं अधिक प्रभावी साबित हो सकती है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर लिए गए निर्णयों में केवल जातिगत दबावों को आधार नहीं बनाया गया, बल्कि विभिन्न वर्गों की संतुलित सहभागिता सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है। निगम-मंडलों और विभिन्न नियुक्तियों में इसके स्पष्ट उदाहरण भी देखने को मिले हैं।

अब केवल दावेदारी या दबाव की राजनीति नहीं, बल्कि वास्तविक जमीनी काम को महत्व

भाजपा की वर्तमान कार्यशैली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब केवल दावेदारी या दबाव की राजनीति नहीं, बल्कि वास्तविक जमीनी काम को महत्व दिया जा रहा है। संगठन की नजर में वह कार्यकर्ता अधिक मूल्यवान है जो कठिन परिस्थितियों में पार्टी के लिए मैदान में खड़ा रहता है, न कि वह जो समय-समय पर जाति का मुद्दा उछालकर स्वयं को उपेक्षित साबित करने का प्रयास करता है। पार्टी के भीतर जातीय असंतोष का शोर मचाने वाले अधिकांश चेहरे वही दिखाई देते हैं जो या तो संगठनात्मक गतिविधियों में निष्क्रिय हैं या फिर लंबे समय से केवल पद प्राप्ति की प्रतीक्षा में राजनीति कर रहे हैं।

संगठन की आलोचना को अपनी राजनीतिक शैली बना चुके नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भी पार्टी की पैनी नजर

संगठन की आलोचना को अपनी राजनीतिक शैली बना चुके नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भी पार्टी की पैनी नजर है। भाजपा नेतृत्व अब केवल सार्वजनिक मंचों पर दिखाई देने वाली गतिविधियों से संतुष्ट नहीं है, बल्कि कार्यकर्ताओं की वास्तविक सक्रियता, जनसंपर्क और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता का लगातार मूल्यांकन कर रहा है। यही वजह है कि आगामी नगरीय निकाय और नगर निगम चुनावों को देखते हुए पार्टी का फीडबैक तंत्र भी सक्रिय कर दिया गया है। सोशल मीडिया की गतिविधियों से लेकर सार्वजनिक चर्चाओं और स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं के व्यवहार तक पर नजर रखी जा रही है।

राजनीतिक अवसरवाद और संगठन निष्ठा एक साथ नहीं चल सकते

विशेष रूप से ऐसे लोगों की सूची तैयार की जा रही है जो पार्टी के कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखते हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर संगठन और नेतृत्व की आलोचना करने में सबसे आगे दिखाई देते हैं। इतना ही नहीं, दूसरे दलों के नेताओं के साथ अत्यधिक मधुर संबंध रखकर स्वयं को भाजपा का प्रतिबद्ध सिपाही बताने वाले चेहरों की गतिविधियां भी संगठन के संज्ञान में हैं। पार्टी अब यह समझ चुकी है कि राजनीतिक अवसरवाद और संगठन निष्ठा एक साथ नहीं चल सकते।

दावेदारी, लॉबिंग या जातीय समीकरण ही निर्णायक नहीं

हाल ही में रजनीश अग्रवाल को राज्यसभा भेजने का निर्णय भी इसी सोच का हिस्सा माना जा रहा है। इस फैसले ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा में अब केवल दावेदारी, लॉबिंग या जातीय समीकरण ही निर्णायक नहीं हैं। संगठन उन लोगों को आगे बढ़ाने के मूड में है जिन्होंने लंबे समय तक पार्टी के लिए काम किया है और जिनकी उपयोगिता केवल चुनावी मौसम तक सीमित नहीं रही है।
कुल मिलाकर भाजपा का संदेश अब पहले से कहीं अधिक स्पष्ट और कठोर है—संगठन में सम्मान, अवसर और जिम्मेदारी उसी को मिलेगी जो मैदान में सक्रिय रहेगा, पार्टी की विचारधारा और कार्यक्रमों के प्रति प्रतिबद्ध रहेगा तथा संकट के समय संगठन के साथ खड़ा दिखाई देगा। केवल जातीय कार्ड खेलकर, संगठन की आलोचना करके या दूसरे दलों से समीकरण साधकर राजनीतिक लाभ लेने का दौर भाजपा में लगातार सिमटता जा रहा है। पार्टी अब “काम करने वाला ही काम का” है, इसी सिद्धांत पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है, जबकि स्थायी

असंतोष और अवसरवादी राजनीति करने वालों को केवल “निंदक नियरे राखिए” की श्रेणी में रखकर देखा जा रहा है।

Exit mobile version