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UP की अगली “फिल्म राज्यसभा” भी होगी काफी दिलचस्प, जानिये कौन होगा हीरो कौन बनेगा विलेन

लखनऊ। गोरखपुर और फूलपुर संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में सपा-बसपा समझौते को मिली जीत सिर्फ 2019 के आम चुनाव को ही प्रभावित नहीं करेगी बल्कि, 23 मार्च को होने जा रहे राज्यसभा चुनाव में भी इसका असर दिखेगा। क्रास वोटिंग का मंसूबा बनाने वाले विपक्ष के विधायक अब आगे कदम बढ़ाने में सौ बार सोचेंगे क्योंकि भविष्य की संभावनाएं गठबंधन में दिखने लगी हैं।

राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा ने 11 और सपा-बसपा ने एक-एक उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय ने पहले ही कह दिया कि उनकी पार्टी के केवल नौ उम्मीदवार मैदान में रहेंगे। भाजपा और सहयोगी अपना दल व सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के कुल 324 विधायक हैं। सपा के पास 47, बसपा के 19, कांग्रेस के सात, तीन निर्दल, एक रालोद और एक निषाद के विधायक हैं। राज्यसभा की एक सीट पर जीत के लिए 37 विधायकों के वोट की जरूरत है।

इस हिसाब से भाजपा के आठ और सपा के एक उम्मीदवार की जीत तय मानी जा रही है। भाजपा के पास 28 विधायकों के वोट बच रहे हैं और निर्दल समेत कुछ और मतों के बल पर वह अपने नवें उम्मीदवार की जीत की उम्मीद पाले है। इस बीच सपा सांसद नरेश अग्रवाल ने भाजपा के पाले में जाकर उसकी राह थोड़ी और आसान की है। पर, चुनौती बसपा उम्मीदवार भीमराव अम्बेडकर के लिए है।

दरअसल, सपा के बचे 10 वोट, बसपा के 19, रालोद के एक और कांग्रेस के सात विधायकों के बल पर बसपा ने अपने उम्मीदवार को जिताने की रणनीति बनाई है। अभी तक यह संकेत मिल रहे थे कि भाजपा के बढ़ते प्रभाव से विपक्ष के कई विधायक टूट जाएंगे। पर, राजनीतिक समीक्षकों का आकलन है कि यह चुनाव परिणाम पाला बदलने वालों को सोचने पर मजबूर करेगा। विपक्ष के विधायक ऐसा करने में सौ बार सोचेंगे। बहरहाल, गुरुवार को नाम वापसी के बाद तस्वीर साफ हो जाएगी कि मैदान में कौन-कौन उम्मीदवार बच रहे हैं। उसके बाद वोटों की गणित फिट करने का खेल शुरू होगा।

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