कटनी। जिले में बालक एवं कुमार श्रम प्रतिशेध एवं विनियमन अधिनियम 1986 एवं उसके अंतर्गत निर्मित संशोधन नियम 2017 के अंतर्गत जिला टास्क फोर्स समिति का गठन किया गया है। जिसके मद्देनजर श्रमिकों एवं कुमार श्रमिकों की पहचान, विमुक्ति, पुर्नवास तथा अधिनियम के प्रवर्तन के लिये कलेक्टर विशेष गढ़पाले की अध्यक्षता में जिला टास्क फोर्स की प्रथम बैठक आयोजित हुई। बैठक में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, बाल कल्याण समिति, जिला बाल श्रम संरक्षण अधिकारी एवं अन्य सदस्यों की उपस्थिति रही।
बैठक में श्रम अधिकारी द्वारा भारत सरकार के निर्देशों से अवगत कराया गया। जिसमें भारत सरकार की नीति जीरो टॉलरेन्स अगेन्स्ट चाईल्ड लेबर एवं पेंसिल पोर्टल के बारे में जानकारी दी। बाल श्रम प्रतिषेध अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये जन जागरुकता अभियान एवं ऐसे संस्थानों में जहां बाल श्रम पाये जाने की संभावना है, वहां छापेमार कार्यवाही के लिये कलेक्टर द्वारा निर्देशित किया गया। इसके अलावा श्रम अधिकारी द्वारा बताया गया कि जिले में केन्द्र सरकार द्वारा प्रायोजित नेशनल चाईल्ड लेबर प्रोजेक्ट भी चलाया जा रहा है। जिसके अंतर्गत 14 वर्ष की उम्र से कम ऐसे बच्चे, जिन्होंने या तो स्कूल छोड़ दिया या कभी स्कूल नहीं गये, उनके लिये विद्यालय चलाने का कार्य किया जायेगा। इसके साथ ही बंधक श्रमिक के रुप में मुक्त कराये गये बच्चों के लिये पुर्नवास करने का भी कार्य इस प्रोजेक्ट के तहत किया जायेगा। एनसीएलपी के तहत लगातार ऐसे बच्चों का सर्वे कराया जाकर उनके लिये विद्यालय खोलने की कार्यवाही निरंतरित है। जिसे शीघ्र ही पूर्ण कर लिया जायेगा।
श्रम अधिकारी ने दी गलत जानकारी, एनजीओ के आरोप
बैठक में श्रम अधिकारी द्वारा नेशनल चाईल्ड लेबर प्रोजेक्ट यानि राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के संचालित होने की जानकारी देकर कलेक्टर व अन्य सदस्यों को गुमराह किया गया, जबकि कटनी जिले में हकीकत यह है कि राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना पूरी तरह से बंद होने की कगार पर पहुंच गई है। एनसीएलपी द्वारा संचालित विशेष बाल श्रम विद्यालयों में बच्चों की संख्या न के बराबर है। यहां पढ़ाने वाले शिक्षकों को कई महीनों से वेतन नहीं मिला है। परिायेजना का संचालन कर रहे एनजीओ ने यशभारत को बताया कि कागजों में भले ही परियोजना संचालित हो लेकिन इसकी हकीकत कुछ ओर ही है। विशेष बाल श्रम विद्यालय पूरी तरह से बंद है, जहां संचालन हो भी रहा है तो वहां बच्चों की संख्या काफी कम है। एनजीओ द्वारा जिला प्रशासन से लेकर श्रम विभाग और परियोजना के अधिकारियों को इससे अवगत भी कराया जा चुका है लेकिन इस ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया है।