पश्चिम का ताज किसके सिर पर ?

जबलपुर। मध्य प्रदेश में जबलपुर का पश्चिम विधानसभा क्षेत्र नर्मदा किनारे बसा शहरी क्षेत्र है। यह मतदाताओं के हिसाब से जिले की सबसे बड़ी सीट है. 1989 तक पश्चिम विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ माना जाता था. धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा ने अपनी पैठ बनाई और इस क्षेत्र को कांग्रेस से भाजपा के गढ़ में तब्दील कर दिया. पिछले तीन चुनावों यानी 1998, 2003, 2008 में भाजपा ने जीत का अंतर लगातार बढ़ाया है, लेकिन 2013 में हुए चुनावों में कांग्रेस ने अप्रत्याशित रूप से भाजपा के गढ़ में सेंध लगाकर यह सीट जीत ली.हालांकि जीत का अंतर एक हजार वोट से भी कम था. फिर भी भाजपा लहर में हजार से भी कम वोट से हारना भी चौंकाने वाला परिणाम माना गया। यहां से मंत्री रह चुके भाजपा नेता हरेंद्रजीत सिंह बब्बू को हराकर कांग्रेस नेता तरुण भनोट ने जीत हासिल की. इससे पहले 2008 के चुनाव में बब्बू ने तरुण को 8900 वोट से हराया था. विधानसभा के परिणाम बताते हैं कि भाजपा और कांग्रेस को मिले मतों का प्रतिशत घटता-बढ़ता रहा है, लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा की लीड इस क्षेत्र में पिछले तीन चुनाव में 25 हजार से हमेशा ज्यादा रही है.
फैक्ट फाइल –
2013 का परिणाम –

तरुण भनोत – कांग्रेस 62668

हरेंद्रजीत सिंह बब्बू – भाजपा 61745

ठाड़ेश्वर महावर – शिवसेना 6048

पिछले चुनावों में मिले वोट –

पार्टी 2003 2008

भाजपा 59.04 49.10

कांग्रेस 35.58 40.16 (वोट प्रतिशत में

कुल मतदाता -2, 41, 075

मतदान केंद्र – 276

पुरुष मतदाता -1, 24, 570

महिला मतदाता – 1,16, 501

थर्ड जेंडर – 04

जातीय समीकरण –
ब्राह्मण बाहुल्य क्षेत्र है। पंजाबी, सिख, ठाकुर, यादव भी रहते हैं। पश्चिम विधानसभा क्षेत्र गोंडवाना कालीन इलाका रहा है। यहां मप्र की पहली नगर निगम 1864 में गढ़ा क्षेत्र में बनी थी। धीरे-धीरे यहां पर नई बसाहट व कॉलोनियां बनने से संभ्रांत और नौकरीपेशा लोग यहां के मतदाता बन गए हैं।

क्षेत्र की बड़ी समस्याएं –
अवैध शराब पवित्र क्षेत्र ग्वारीघाट क्षेत्र में बिक रही है। शासकीय जमीनों और पहाड़ी पर अवैध कब्जा। गोरखपुर,मदनमहल और ग?ा बाजार में यातायात की समस्या। छोटीलाइन फाटक का विकास ।

बड़े वादे और स्थिति –
मदन महल से फ्लाई ओवर निर्माण का वादा अधूरा पेयजल संकट का समाधान आंशिक रूप से ही हुआ है। गरीबों को पट्टा वितरण भी हो रहा है।

विधायक व पूर्व विधायक सक्रिय रहे, दोनों के पीछे कई दावेदार भी –

लगातार तीन चुनाव जीतने वाले भाजपा नेता हरेंद्रजीत सिंह बब्बू हारने के बाद भी जमीनी स्तर पर सक्रिय हैं। उनकी हार के बाद भाजपा के दर्जनभर दावेदार टिकट की दौड़ में खड़े हैं। इसमें आरएसएस से जुड़े बड़े नेता भी शामिल हैं, इसलिए यहां भी गुटबाजी दिख रही है। वहीं कांग्रेस की ओर से वर्तमान विधायक तरुण भनोत ने भी भाजपा के परंपरागत वोट में सेंध लगाई है। उन्होंने क्षेत्र में अनेक धार्मिक आयोजन कर खुद को हिंदुवादी नेता के तौर पर पेश करने का प्रयास किया। कांग्रेस में भी गुटबाजी है।

क्या कहता है राजनीतिक समीकरण
पिछले 5 सालों में वर्तमान विधायक ने क्षेत्र में सक्रियता बनाकर रखी है शुरुआत के 1 साल में भले तरुण भनोट नदारद थे परंतु पिछले 4 साल में अपनी जनता के मध्य हर जगह नजर अपनी जनता के मध्य हर जगह नजर आएवहीं दूसरी तरफ अपने आप को गरीबों का नेता बोलने वाले भाजपा दावेदार क्षेत्र में अपराधों को लेकर आवाज उठाते रहे हैं जिससे सक्रियता बनी रहे।

माइनस प्वाइंट
ओवरकॉन्फिडेंस ले ना डूबे
वर्तमान विधायक तरुण भनोट1999 से वर्ष 2004 तक कांग्रेस से पार्षद रहे। इस दौरान एमआईसी सदस्य का प्रभार भी संभाला। इसके बाद लगातार क्षेत्र और जनता के बीच में सक्रियता थी, वर्ष 2013 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीता। सबसे बड़ी बात जनता से बराबर जुड़ा बना हुआ है तथा , युवा वर्ग में अच्छी खासी पैठ विधायक तरुण भानोत रखते हैं। परंतु अतिक्रमण की कार्यवाही के वक्त विधायक जी की सक्रियता कुछ जगहों पर काम नहीं आ पाई जिसके चलते जनता में कुछ जगह विरोध तो है तथा सबसे बड़ी समस्या प्रचार-प्रसार के वक्त यह दिख रही है कि जनता अपने विधायक को वोट मांगते देखना चाहती है परंतु विधायक द्वारा कुछ क्षेत्रों में अपने छोटे भाई गौरव भानोत को भेजकर वोट मांगा जा रहा है जिसके चलते आम जनता इस बात से रूष्ट है कि हमारा विधायक कहां है?
वहीं भाजपा प्रत्याशी हरेंद्र सिंह जीत का भाजपा संगठन में जमकर विरोध चल रहा है, टिकट के दावेदार ने तो भाजपा कार्यालय के सामने आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी और कुछ संगठन के कार्यकर्ताओं और मंडल के कार्यकर्ताओं ने इस बात का जिक्र भी किया था कि बब्बू द्वारा अकाली दल के दबाव पर टिकट लाया गया है अर्थात वह भाजपा का कोई कार्यकर्ता नहीं है जिस बात को बाबू द्वारा क्षेत्र में जमकर प्रचारित किया जा रहा है अर्थात संगठन में बब्बू के खिलाफ जमकर विरोध चल रहा है। कुछ जगहों पर यह बात भी खुलकर सामने आएगी संघ को टिकट के लिए बब्बू पसंद नहीं थे।
59 वर्षीय बब्बू तीन बार विधायक, एक बार मंत्री रहे
पॉलीटिकल कनेक्शन – पिता की हत्या के बाद भाजपा के आला नेताओं से जुड़ाव रहा तथा अकाली दल के भी बेहद करीब हैं।वर्ष 1998 में पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरे और जीत हासिल की। इसके बाद लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव जीता और मंत्री भी बने। 2013 में हार के बावजूद लगातार राजनीति में सक्रिय थे।

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