Monday, May 11, 2026
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UP के मंत्री का बड़ा बयान: संस्कार बिगाड़ रही हैं ‘जॉनी-जॉनी’ जैसी कविताएं; धर्मेंद्र प्रधान को लिखा पत्र, सिलेबस से हटाने की मांग, जानें क्या है पूरा विवाद?

UP के मंत्री का बड़ा बयान: संस्कार बिगाड़ रही हैं ‘जॉनी-जॉनी’ जैसी कविताएं; धर्मेंद्र प्रधान को लिखा पत्र, सिलेबस से हटाने की मांग, जानें क्या है पूरा विवाद?। उत्तरप्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने नर्सरी की लोकप्रिय अंग्रेजी कविताओं (Nursery Rhymes) पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मंत्री का दावा है कि ‘जॉनी-जॉनी यस पापा’ और ‘रेन रेन गो अवे’ जैसी कविताएं बच्चों को अनजाने में झूठ बोलना, स्वार्थी बनना और बड़ों का मजाक उड़ाना सिखा रही हैं। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पत्र लिखकर इन कविताओं को पाठ्यक्रम से हटाने की मांग की है।

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कविताओं पर मंत्री के तर्क: झूठ और असम्मान का पाठ

शनिवार को कानपुर में शिक्षामित्र सम्मान समारोह के दौरान योगेंद्र उपाध्याय ने इन कविताओं का ‘पोस्टमार्टम’ करते हुए कई तर्क दिए:

  • ‘जॉनी-जॉनी यस पापा’ पर आपत्ति: मंत्री ने कहा कि इस कविता में बच्चा चीनी खाने की बात पर पिता से झूठ बोलता है (Telling a lie, no papa)। यह बच्चे के कोमल मन पर झूठ बोलने का संस्कार डालता है। साथ ही ‘ओपन योर माउथ, हा-हा-हा’ वाली लाइन बड़ों का मजाक उड़ाना सिखाती है।

  • ‘रेन रेन गो अवे’ पर सवाल: उन्होंने कहा कि ‘लिटिल जॉनी वांट्स टू प्ले’ वाली लाइन निजी स्वार्थ सिखाती है। भारतीय संस्कृति में बारिश को देव रूप माना जाता है, लेकिन यह कविता अपने खेलने के लिए बारिश को हटाने की बात करती है, जो स्वार्थ की निशानी है।

“अंग्रेजी से विरोध नहीं, संदेश से आपत्ति”

न्यूज एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए मंत्री ने साफ किया कि वे अंग्रेजी भाषा या कविताओं के विरोधी नहीं हैं। उन्होंने कहा, “शिक्षा वह है जो संस्कार दे। संस्कार विहीन शिक्षा से राष्ट्र निर्माण नहीं हो सकता। जाने-अनजाने हम ऐसी बातें सिखा जाते हैं जो बच्चों में कुसंस्कार भर देती हैं। मेरा विरोध उस संदेश से है जो इन कविताओं के माध्यम से बच्चों तक पहुँच रहा है।”

स्कूलों और विपक्ष की प्रतिक्रिया

योगेंद्र उपाध्याय ने दावा किया कि जब उन्होंने यह बात कुछ स्कूलों के शिक्षकों से कही, तो उन्होंने इसे गहराई से समझा और बदलाव की बात स्वीकार की। हालांकि, विपक्ष ने इस पर चुटकी लेते हुए इसे ‘अति-बुद्धिजीवी’ सोच और ‘अंग्रेजी विरोध’ का हिस्सा बताया है। मंत्री ने पलटवार करते हुए कहा कि यह समझदारी का फर्क है और विपक्ष को अपनी समझ ठीक करनी चाहिए।

निष्कर्ष: क्या वाकई नर्सरी की कविताएं बच्चों के चरित्र पर असर डालती हैं या यह सिर्फ एक राजनीतिक नजरिया है? इस मुद्दे पर अब राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ना तय माना जा रहा है।

Usha Pamnani

20 वर्षों से डिजिटल एवं प्रिंट मीडिया की पत्रकारिता में देश-विदेश, फ़िल्म, खेल सहित सामाजिक खबरों की एक्सपर्ट, वर्तमान में यशभारत डॉट कॉम में वरिष्ठ जिला प्रतिनिधि