कहीं छिन न जाये टाइगर स्टेट का दर्जा, पिछले एक साल में आधा सैकड़ा से भी ज्यादा बाघों की मौत

कटनी। (राजा दुबे) एक ओर जहां जंगलों में बाघों की मौतों के आंकड़े साल दर साल बढ़ते चले जा रहे वहीं दूसरी ओर जंगल से बाहर बाघ एवं अन्य हिंसक वन्य प्राणियों के हमलों से इंसानी मौतों में भी लगातार इजाफ़ा हो रहा। वन एवं नेशनल पार्कों का प्रबंधन देखने वाले उच्चाधिकारियों सहित वन्यजीव प्रेमियों को बाघों के मरने की चिंता तो है पर बाघों के हमलों से इंसानी मौतों को लेकर अधिकारियों को कोई चिंता नहीं। सरकार ने बाघों या अन्य हिंसक वन्यप्राणियों के हमले से इंसानी मौतों पर मुआवजे की राशि बढ़ाकर दो गुना कर दी है पर बाघों के हमले रोकने कोई ठोस कदम नहीं उठाये जा रहे। आये दिन बांधवगढ़ नेशनल पार्क से लगे कटनी जिले के बरही, खितौली और बड़वारा क्षेत्र के गांवों के ग्रामीण बाघों के हमलों में अपनी जान गंवा रहे।
बांधवगढ़ पार्क एरिया में जनवरी माह में ही अब तक चार बाघों की मौत
एक जानकारी के अनुसार बांधवगढ़ पार्क एरिया में जनवरी माह में ही अब तक चार बाघों की मौत हो चुकी है। दो दिन पहले बरही के आगे मानपुर बफर जोन में आने वाली कुचवाही बीट में एक 5 वर्षीय बाघिन का शव बरामद हुआ है। इससे पहले जनवरी में ही खितौली के पनपथा कोर एरिया में दो शावकों के शव मिले थे। वन विभाग या पार्क प्रबन्धन से जुड़े उच्चाधिकारी बाघों की इन मौतों के पीछे बाघों के बीच वर्चस्व को लेकर आपसी संघर्ष को कारण बता कर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करते नज़र आते हैं। अक्सर इलाके को लेकर बाघों के बीच आपसी संघर्ष होता है पर सभी बाघों की मौत आपसी संघर्ष की वजह से हो रही हो ऐसा भी नहीं। जंगलों में अभी भी शिकारी गिरोह सक्रिय रहते हैं जो मौका पाकर कभी करंट से तो कभी फंदा लगाकर बाघ का शिकार कर लेते हैं। बताया गया कि बांधवगढ़ सहित प्रदेश के अलग अलग वन क्षेत्रों में पिछले साल दिसंबर तक आधा सैकड़ा से अधिक बाघों की मौत हो चुकी है। एक महीने में प्रदेश में बाघों की मौत का यह आंकड़ा पिछले 50 सालों में सर्वाधिक है। बाघों की बढ़ती मौतों को लेकर एक याचिका मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में भी दायर की जा चुकी है जिसकी सुनवाई करते हुए न्यायालय ने सम्बन्धित अधिकारियों से जवाब मांगा है।
जंगल में बाघों की मौत हो या जंगल के बाहर बाघों के हमले से इंसानी मौतों का मामला हो दोनों के पीछे एक बड़ा कारण बाघों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी है।
संख्या के हिसाब से क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ रहा
एक ओर बाघों की संख्या बढ़ रही वहीं दिनोदिन जंगलों की सीमाएं सिमटती जा रहीं। संख्या के हिसाब से क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ रहा। एक वयस्क बाघ 10 वर्ग किलोमीटर के एरिये को अपनी टेरेटरी बनाता है। अपने इलाके में वह दूसरे बाघ का दखल बर्दाश्त नहीं करता। आमना सामना होते ही दोनों में संघर्ष होना तय है जिसमें एक बाघ या तो मारा जाता है या गंभीर रूप से घायल हो जाता है। इस तरह आपसी संघर्ष में जख़्मी हुआ बाघ कोर एरिया छोड़कर बफर जोन में चला जाता है और कभी – कभी तो गांवों में आबादी क्षेत्र में भी पहुंच जाता है। बूढ़ा या बीमार या चोटिल बाघ कोर एरिये में सामान्य रूप से शिकार नहीं कर पाता। तेज भागते हिरण सांभर या भारी भरकम जंगली भैंसे उसकी पहुंच से दूर हो जाते है जबकि गांवों के मवेशी या इंसान आसानी से उसके शिकार हो जाते हैं। जब जंगल में बाघ ज्यादा हो जाते हैं तब तेंदुए जैसे कम ताकत वाले वन्य जीवों को भी कोर एरिया छोड़ कर बफर एरिया या आबादी क्षेत्र में भोजन की तलाश करनी पड़ती है। यही कारण है कि इंसानो और मवेशियों पर हिंसक वन्य जीवों के हमले बढ़ रहे हैं।
एक जानकारी के अनुसार इन दिनों बांधवगढ़ के बफर जोन में 25 से भी अधिक बाघों के मूवमेंट है। कटनी जिले के पड़ोसी पन्ना जिले के बफर जोन सहित सिवनी के पेंच,सीधी के संजय गांधी,मंडला के कान्हा आदि के बफर जोन में भी बाघ काफी संख्या में विचरण कर रहे। ताकतवर बाघों के कारण ये कोर एरिये में नहीं जा पाते साथ ही शारीरिक अक्षमता के कारण वन्य जीवों के शिकार में इन्हें सफलता नही मिलती जबकि इंसान या मवेशी आसानी से इनका शिकार बन जाते हैं। जंगलों के बफ़र जोन के आस पास लगभग सात सैकड़ा गांव बसे हुए हैं।
148 करोड़ के प्रावधान के बाद भी नतीजा सिफर
बताया गया कि बाघों अथवा अन्य हिंसक जीवों से इंसानो और मवेशियों को बचाने कोर और बफ़र एरिये के बीच ऊंची बाड़ लगाने 148 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था पर इस पर कोई काम अब तक दिखाई नहीं दिया। इसके अलावा जंगलो में बाघों की बढ़ती संख्या के हिसाब से कोर एरिया में भी बढ़ोतरी करनी होगी तभी क्षेत्रीय असंतुलन समाप्त हो पायेगा वरना न तो आपसी संघर्ष में बाघों की मौत रुक पाएगी ना ही बाघों के हमले से इंसानो को बचाया जा सकेगा।
टाईगर स्टेट का दर्जा बनाये रखना भी चुनौती होगी
यहां यह उल्लेखनीय है कि देश में सर्वाधिक बाघ मध्यप्रदेश में ही हैं इसीलिए मध्यप्रदेश को टाईगर स्टेट का दर्जा मिला हुआ है। पिछले कई सालों से मध्यप्रदेश टाईगर स्टेट बना हुआ है। पिछली बार की गणना में देश में कुल 3167 बाघ पाए गए थे जिनमें अकेले मध्यप्रदेश में 785 बाघ थे। इन दिनों फिर बाघों की गणना चल रही। अगर मध्यप्रदेश में आपसी संघर्ष अथवा अन्य कारणों से बाघों की मौत का सिलसिला जारी रहा तो मध्यप्रदेश से टाईगर स्टेट का दर्जा छिन भी सकता है।








