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‘सिर्फ सजा देने के लिए’ ट्रायल कोर्ट ने किया घोर अन्याय; एमपी हाई कोर्ट ने उम्रकैद काट रहे संजय गुप्ता को 9 साल बाद किया बाइज्जत बरी

'सिर्फ सजा देने के लिए' ट्रायल कोर्ट ने किया घोर अन्याय; एमपी हाई कोर्ट ने उम्रकैद काट रहे संजय गुप्ता को 9 साल बाद किया बाइज्जत बरी

जबलपुर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ (Division Bench) ने एक बहुचर्चित हत्याकांड के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने रायसेन जिले की ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को पूरी तरह निरस्त करते हुए, पिछले 9 वर्षों से जेल की सलाखों के पीछे बंद अपीलकर्ता संजय गुप्ता को तत्काल रिहा करने और सभी आरोपों से बाइज्जत बरी करने का आदेश दिया है।

‘सिर्फ सजा देने के लिए’ ट्रायल कोर्ट ने किया घोर अन्याय; एमपी हाई कोर्ट ने उम्रकैद काट रहे संजय गुप्ता को 9 साल बाद किया बाइज्जत बरी

अपील की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट की गंभीर कमियों को देखकर हाई कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:

“ट्रायल कोर्ट ने इस पूरे मामले की सुनवाई के दौरान अपना ट्रैक (सही दिशा) खो दिया और ‘हुक या क्रूक’ (किसी भी तरह से) सिर्फ दोषसिद्धि (सजा देने) का निर्णय पारित कर दिया। यह अपीलार्थी के साथ कानूनन घोर अन्याय है।”

क्या था पूरा मामला और ट्रायल कोर्ट का फैसला?

  • घटना: यह मामला 7 अप्रैल, 2015 का है, जब रायसेन जिले के मंडीदीप में रहने वाले 12 वर्षीय मासूम नितिन की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। उसका शव एक बोरे में बंद कूड़े के ढेर से मिला था।

  • आरोप: पुलिस ने मंडीदीप निवासी संजय गुप्ता पर आरोप लगाया था कि उसने नितिन को अपने घर बुलाया, उसकी हत्या की और सबूत मिटाने के लिए शव को बोरे में भरकर फेंक दिया।

  • निचली अदालत का निर्णय: रायसेन की ट्रायल कोर्ट ने परिस्थितियों के आधार पर 3 अप्रैल, 2017 को संजय गुप्ता को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास (उम्रकैद) और 17 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस निर्णय के बाद से ही आरोपी लगातार जेल में बंद था।

 वकीलों की दलीलें जिन्होंने पलट दिया पूरा केस

हाई कोर्ट में अपीलकर्ता संजय गुप्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद कुमार शुक्ला, आशीष त्रिवेदी, प्रशांत अवस्थी और असीम त्रिवेदी ने पैरवी की। डिफेंस काउंसिल ने कोर्ट के सामने पुलिस थ्योरी और ट्रायल कोर्ट के फैसले की धज्जियां उड़ाते हुए निम्नलिखित अकाट्य तर्क रखे:

  1. फैक्ट्री में ड्यूटी और अलबाई (Alibi): गवाह प्रेमसिंह लोवंशी के बयान के अनुसार, घटना के दिन (7 अप्रैल, 2015) संजय गुप्ता सुबह 8:30 बजे से शाम 5:00 बजे तक ‘आकाश फैक्ट्री’ में अपनी ड्यूटी पर तैनात था। इसके बाद रात 8:00 बजे से वह भोपाल में अपने मालिक की बेटी की बर्थडे पार्टी में शामिल था।

  2. लास्ट सीन थ्योरी फेल: पुलिस ने दावा किया था कि बच्चे को आखिरी बार संजय के साथ देखा गया था। लेकिन मुख्य गवाह साहब सिंह ने कोर्ट में साफ कहा कि उसने नितिन को संजय के साथ नहीं, बल्कि संजय के बेटे के साथ देखा था।

  3. लापरवाह जांच (Delayed Investigation): पुलिस ने घटना के दो महीने बाद (4 जून, 2015) जब्ती का ज्ञापन बनाया। यही नहीं, कथित तौर पर जब्त की गई सामग्री को जांच के लिए एफएसएल (FSL) लैब 4 से 6 महीने बाद (30 अक्टूबर, 2015) भेजा गया।

हाई कोर्ट का निष्कर्ष: पुलिस की मनगढ़ंत कहानियां और टूटी कड़ियां

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और केस डायरी का गहन अध्ययन करने के बाद हाई कोर्ट ने पाया कि पूरा मामला केवल संदेह और विरोधाभासों पर टिका था:

  • फर्जी बरामदगी: पुलिस ने दावा किया था कि संजय के बाथरूम से सेमी-लिक्विड ब्लड मिला है, लेकिन 9 अप्रैल, 2015 को बनाए गए शुरुआती पंचनामे में ऐसी किसी बरामदगी का कोई जिक्र ही नहीं था।

  • अवैज्ञानिक जांच: जिस हथौड़े को कत्ल का हथियार बताया गया, उसका मेडिकल रिपोर्ट से कोई कनेक्शन साबित नहीं हुआ। हत्या में इस्तेमाल बताए गए पेचकस पर आरोपी के फिंगरप्रिंट तक नहीं लिए गए। खुले प्लॉट से मिली चप्पल का साइज तक पुलिस ने दर्ज नहीं किया था।

  • बयानों में विरोधाभास: मुख्य गवाह साहब सिंह के बयान पुलिस डायरी और अदालत के सामने इतने विरोधाभासी थे कि पुलिस की कहानी में जो ‘कार’ थी, वह कोर्ट रूम तक आते-आते ‘मोटरसाइकिल’ में बदल गई।

  • चेन ऑफ कस्टडी टूटी: जब्त माल को 6 महीने तक मालखाने में असुरक्षित रखा गया, जिससे फॉरेंसिक सबूतों के साथ छेड़छाड़ की पूरी आशंका थी।

सुप्रीम कोर्ट के ‘शरद बिरधीचंद सारदा’ केस का हवाला

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘शरद बिरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले की विधिक व्यवस्था का हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि:

“परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) के आधार पर तय होने वाले मामलों में यदि संदेह से परे दोषसिद्धि करनी है, तो सबूतों की पूरी चेन (कड़ी) जुड़ी होनी चाहिए। यदि इस चेन की एक भी कड़ी टूटती है, तो आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) मिलना अनिवार्य है और उसके आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।”

इन मजबूत कानूनी आधारों पर हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का दंडादेश निरस्त करते हुए संजय गुप्ता को तत्काल जेल से रिहा करने का आदेश जारी कर दिया है।

MP News

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