Supreme Court Landmark Judgment: वेश्यावृत्ति को पूरी तरह खत्म करना या अपराध बनाना कानून का मकसद नहीं; अकेले घर में काम करने वाली महिला का निवास ‘वेश्यालय’ नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Supreme Court Landmark Judgment: वेश्यावृत्ति को पूरी तरह खत्म करना या अपराध बनाना कानून का मकसद नहीं; अकेले घर में काम करने वाली महिला का निवास 'वेश्यालय' नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 70 वर्ष पुराने अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (ITPA) की एक नई और व्यापक कानूनी व्याख्या करते हुए बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष न्यायालय ने साफ कर दिया है कि इस कानून का मूल उद्देश्य वेश्यावृत्ति (Prostitution) को पूरी तरह से समाप्त करना या इसे स्वतः एक अपराध घोषित करना नहीं है, बल्कि इसके नाम पर होने वाले व्यावसायीकरण (Commercialization), मानव तस्करी (Human Trafficking) और शोषणकारी नेटवर्क (Exploitative Networks) पर पूरी तरह रोक लगाना है।
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जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून का पूरा फोकस उन अपराधियों, दलालों और तस्करों पर है जो इस मजबूरी का व्यावसायिक लाभ उठाते हैं, न कि स्वेच्छा या मजबूरी में इसमें संलिप्त महिलाओं को दंडित करना।
अकेले घर में काम करना ‘वेश्यालय’ (Brothel) नहीं: कोर्ट की सबसे बड़ी व्याख्या
जस्टिस पारदीवाला द्वारा लिखे गए 298 पन्नों के इस ऐतिहासिक फैसले में ‘वेश्यालय’ (Brothel) शब्द की कानूनी परिभाषा को पूरी तरह स्पष्ट किया गया है, जो इस प्रकार है:
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अकेले काम करने की स्वतंत्रता: यदि कोई महिला अकेले अपने घर में अपनी आजीविका चलाने के लिए वेश्यावृत्ति करती है, और वहां कोई दूसरी महिला शामिल नहीं है, तो उसे अपराधी नहीं माना जाएगा।
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बिचौलियों की अनुपस्थिति: यदि उस स्थान पर किसी दलाल (Pimp), बिचौलिए या किसी बाहरी शोषक व्यक्ति की कोई भूमिका नहीं है, तो कानून की नजर में उस महिला के निवास स्थान को ‘वेश्यालय’ नहीं माना जा सकता।
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अदालत का तर्क: कोर्ट ने कहा कि किसी महिला द्वारा अकेले इस्तेमाल किए जा रहे घर को केवल इस आधार पर वेश्यागृह नहीं ठहराया जा सकता कि वह वहां से अपनी जीविका कमा रही है। यह व्याख्या महिलाओं को पुलिसिया उत्पीड़न से बचाने में सुरक्षा कवच का काम करेगी।
ऐतिहासिक संदर्भ: तस्करों और दलालों के खिलाफ बना था कानून
वेश्यालयों से मुक्त कराई गई महिलाओं के पुनर्वास (Rehabilitation) से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने इस कानून की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर भी रोशनी डाली:
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20वीं सदी की समस्या: अदालत ने कहा कि जब यह कानून बना था, तब महिलाओं और बच्चियों की जबरन तस्करी एक बहुत बड़ी सामाजिक समस्या थी। समाज इसे एक बेहद अनैतिक गतिविधि के रूप में देखता था, इसी वजह से कानून के नाम में ‘अनैतिक’ (Immoral) शब्द जोड़ा गया था।
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शोषकों पर वार: कोर्ट ने दोहराया कि आईटीपीए (ITPA) मुख्य रूप से संगठित सिंडिकेट, दलालों और मानव तस्करी करने वाले अपराधियों की रीढ़ तोड़ने के लिए बनाया गया था, न कि पीड़ित या इसमें संलिप्त महिलाओं को समाज से बहिष्कृत या प्रताड़ित करने के लिए।
सार्वजनिक स्थानों पर पाबंदी: शालीनता और सामाजिक व्यवस्था जरूरी
अदालत ने यह भी साफ किया कि वह वेश्यावृत्ति को पूरी तरह से अनियंत्रित छोड़ने की वकालत नहीं कर रही है। अधिनियम की धारा 7 और धारा 8 को लेकर कोर्ट ने जरूरी सीमाएं तय की हैं:
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धारा 7 (सार्वजनिक स्थलों के पास पाबंदी): शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक स्थलों या सरकार द्वारा अधिसूचित सार्वजनिक क्षेत्रों के निकट वेश्यावृत्ति पूरी तरह से प्रतिबंधित और दंडनीय रहेगी।
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धारा 8 (ग्राहकों को आकर्षित करना अपराध): सार्वजनिक स्थानों पर खड़े होकर ग्राहकों को आकर्षित करना, आवाज लगाना या उन्हें बुलाना कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी में ही रहेगा।
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उद्देश्य: पीठ ने कहा कि इन दोनों धाराओं का उद्देश्य समाज में सार्वजनिक शालीनता (Public Decency), सामाजिक व्यवस्था और आम नागरिकों की सुविधा व शांति बनाए रखना है।
सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष: “अदालत न तो वेश्यावृत्ति को पूरी तरह से अपराध घोषित कर रही है और न ही इसे पूरी तरह अनियंत्रित छोड़ रही है। हमारा उद्देश्य कानून के वास्तविक इरादे को स्पष्ट करना है, जो कि किसी भी महिला के शोषण और उसके व्यावसायिक दोहन को रोकना है।”
Supreme Court Landmark Judgment: वेश्यावृत्ति को पूरी तरह खत्म करना या अपराध बनाना कानून का मकसद नहीं; अकेले घर में काम करने वाली महिला का निवास ‘वेश्यालय’ नहीं: सुप्रीम कोर्ट














