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कोर्ट मध्यस्थता फैसलों को संशोधित कर सकती हैं : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम फैसले में कहा कि अदालतें 1996 के मध्यस्थता और सुलह कानून के तहत मध्यस्थता फैसलों को संशोधित कर सकती हैं. सीजेआई संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने एक के मुकाबले चार के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि कुछ परिस्थितियों में मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के प्रावधानों का प्रयोग करके मध्यस्थता निर्णय को संशोधित किया जा सकता है.

यह फैसला वाणिज्यिक विवादों में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता फैसलों को प्रभावित करेगा. हालांकि, फैसला सुनाते हुए, सीजेआई ने अदालतों को मध्यस्थता फैसलों को संशोधित करने में सावधानी बरतने का आदेश दिया. सीजेआई खन्ना ने कहा, ‘संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की विशेष शक्तियों का प्रयोग निर्णयों में बदलाव के लिए किया जा सकता है. लेकिन इस शक्ति का प्रयोग संविधान के दायरे में बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए.’

हालांकि, जस्टिस के वी विश्वनाथन ने इससे असहमति जताते हुए कहा कि अदालतें मध्यस्थता के फैसलों में बदलाव नहीं कर सकतीं. बहुमत के फैसले में उन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनमें कोर्टों द्वारा मध्यस्थता संबंधी निर्णयों को संशोधित करने के सीमित अधिकार का प्रयोग किया जा सकता है.

सीजेआई खन्ना ने कहा कि इस अधिकार का प्रयोग किसी भी लिपिकीय, गणना या मुद्रण संबंधी त्रुटि को सुधारने के लिए किया जा सकता है, जो रिकॉर्ड में गलत प्रतीत होती है. बहुमत के फैसले में कहा गया कि इस अधिकार का प्रयोग कुछ परिस्थितियों में फैसले के बाद के हित को संशोधित करने के लिए किया जा सकता है.

संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले या मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक कोई भी आदेश पारित करने का अधिकार देता है.

यह विवेकाधीन शक्ति कोर्ट को कड़ी कानूनी जरूरतों से आगे जाकर उन स्थितियों में न्याय तय करने की अनुमति प्रदान करती है जहां मौजूदा कानून अपर्याप्त या फिर अपूर्ण हो सकते हैं.

बता दें कि कोर्ट ने तीन दिन तक पक्षों की सुनवाई के बाद 19 फरवरी को कानूनी मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

मामले में अंतिम सुनवाई 13 फरवरी को शुरू हुई थी, जब 23 जनवरी को तीन जस्टिस की पीठ ने यह मामला उसके समक्ष भेजा था. मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अलावा वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार, डेरियस खंबाटा, शेखर नाफड़े, रितिन राय, सौरभ कृपाल और गौरब बनर्जी ने अपनीं दलीलें रखी थीं.

 

वहीं दातार के नेतृत्व में वकीलों ने दलीलें दी कि कोर्टों को मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत कुछ आधार पर मध्यस्थता के फैसलों को रद्द करने का अधिकार है, वे इसमें संशोधन भी कर सकते हैं, क्योंकि उनके अधिकारों में कुछ हद तक विवेकाधिकार भी शामिल हैं.

वहीं वकीलों के एक अन्य ग्रुप ने तर्क दिया कि संशोधित शब्द, जो कि कानून में नहीं था, को गैर-मौजूद शक्तियों के रूप में नहीं देखा जा सकता है. इसके अलावा मध्यस्थता और सुलह अधिनियम के तहत मध्यस्थता विवाद हल का एक वैकल्पिक तरीका है और यह न्यायाधिकरणों द्वारा दिए गए निर्णयों में हस्तक्षेप करने में कोर्ट की भूमिका को न्यूनतम करता है.

 

वहीं अधिनियम की धारा 34 प्रक्रियागत अनियमितताओं, सार्वजनिक नीति के उल्लंघन या अधिकार क्षेत्र की कमी जैसे सीमित आधारों पर मध्यस्थता फैसलों को रद्द करने का प्रावधान प्रदान करती है. वहीं, धारा 37 मध्यस्थता से संबंधित आदेशों के विरुद्ध अपील को नियंत्रित करती है, जिसमें फैसले को रद्द करने से मना करने वाले आदेश भी शामिल हैं.

इसके अलावा धारा 34 की तरह इसका मकसद भी न्यायिक हस्तक्षेप को न्यूनतम करना है तथा निगरानी की जरूरत वाले असाधारण मामलों पर विचार करना है.

हालांकि पीठ ने पूर्व में कहा था, ‘उपर्युक्त प्रश्न पर गौर करते समय, कोर्ट की शक्ति की रूपरेखा और दायरे की भी जांच करेगा और यदि संशोधन का अधिकार मौजूद है, तो उसका किस हद तक उपयोग किया जा सकता है.’ मामला गायत्री बालासामी बनाम आईएसजी नोवासॉफ्ट टेक्नोलॉजीज लिमिटेड से पैदा हुआ.

कोर्ट ने पारंपरिक रूप से इस धारा की संकीर्ण व्याख्या की है तथा मध्यस्थता के अंतिम निर्णय और दक्षता के सिद्धांतों को कायम रखने के लिए आदेश के गुण-दोष की समीक्षा से परहेज किया है.

फरवरी 2024 में, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस के वी विश्वनाथन और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कुछ प्रश्न तैयार किए और मामले को विचार के लिए सीजेआई के पास भेज दिया.

Vivek Shukla

28 वर्ष से पत्रकारिता, क्राइम रिपोर्टर के रूप में लंबा अनुभव डिजिटल मीडिया में सक्रिय, खबरों का फॉलोअप तथा उसकी तह तक जाना वर्तमान में यशभारत डॉट कॉम में उप संपादक