मेनका गांधी का बड़ा बयान: ‘कानूनी छूट से बढ़ा मोरों का अवैध शिकार, परंपरा के नाम पर जानवरों से क्रूरता बर्दाश्त नहीं’
नई दिल्ली: अपने बेबाक बयानों और पशु अधिकारों के लिए मुखर रहने वाली पूर्व केंद्रीय मंत्री व बीजेपी नेता मेनका गांधी ने एक बार फिर पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण को लेकर देश के मौजूदा नियमों पर तीखा हमला बोला है। नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि हमारे कुछ कानून और सामाजिक रीति-रिवाज अनजाने में ही सही, लेकिन मूक बेजुबानों के खिलाफ क्रूरता और उनके कमर्शियल इस्तेमाल (व्यावसायिक शोषण) को बढ़ावा दे रहे हैं।
1972 के वन्यजीव संरक्षण कानून पर उठाए सवाल
मेनका गांधी ने इस पूरी समस्या की जड़ 1972 के वन्यजीव संरक्षण कानून (Wildlife Protection Act) में दी गई एक खास छूट को बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कानून में दिगंबर संप्रदाय के जैन साधुओं को ‘पिच्छी’ (झड़े हुए मोर पंखों से बनने वाला छोटा ब्रश) रखने और इस्तेमाल करने की धार्मिक इजाजत दी गई थी।
“एक बार दरवाजा खुला, तो पूरा उद्योग खड़ा हो गया” मेनका गांधी ने आगाह करते हुए कहा, “वह छूट एक पवित्र मंशा से दी गई थी। लेकिन एक बार जब कानूनी दरवाजा खुला, तो इसके आस-पास एक पूरा कमर्शियल उद्योग खड़ा हो गया।” उन्होंने इस धारणा को पूरी तरह खारिज कर दिया कि बाजार की भारी मांग को पूरा करने के लिए मोरों से प्राकृतिक रूप से इतने पंख मिल जाते हैं। उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि इस व्यावसायिक मांग को पूरा करने के लिए मोरों का बड़े पैमाने पर अवैध शिकार किया जा रहा है।
अटल सरकार के समय कानून बदलने की हुई थी कोशिश
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने खुलासा किया कि उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान कानून की इस कमी को दूर करने के लिए एक कानूनी संशोधन लाने की पुरजोर कोशिश की थी, लेकिन वह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका। उन्होंने साफ किया कि उनकी आलोचना किसी खास समुदाय या धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि इस बात पर है कि कैसे एक कानूनी छूट का माफियाओं द्वारा गलत इस्तेमाल किया जा रहा है।मेनका गांधी का बड़ा बयान: ‘कानूनी छूट से बढ़ा मोरों का अवैध शिकार, परंपरा के नाम पर जानवरों से क्रूरता बर्दाश्त नहीं’
केरल की घटना का जिक्र: ‘क्या बम लगाकर जानवरों के जबड़े तोड़ना हमारी परंपरा है?’
जैन संगठनों के विरोध और कानूनी नोटिसों का कड़ा जवाब देते हुए मेनका गांधी अपनी बात पर अड़ी रहीं। उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान केरल के मलप्पुरम में हुई एक दिल दहला देने वाली घटना का जिक्र किया, जहां फलों के अंदर बारूद छिपाकर रख दिया जाता था, जिसे खाने से हाथियों के जबड़े फट जाते थे।
उन्होंने तीखे लहजे में कहा, “जब इस पर कार्रवाई की बात आई तो कहा गया कि ‘यह हमारा रिवाज है।’ मैं पूछती हूँ कि क्या बम लगाना और बेजुबान जानवरों के जबड़े तोड़ना हमारी परंपरा हो सकती है?”
